मुझमें भगवान देख (कृष्ण-अर्जुन संवाद) - त्रिपुरारी कुमार पांडेय

संपूर्ण जगत् है अंश समझ,
इसलिए पार्थ बस मुझको भज।
मैं आत्म-रूप, मैं ही स्वरूप,
विधि-तेज-ताप, मेरा प्रताप।
मैं भूत और हूँ वर्तमान, 
शंकर-विष्णु-ब्रह्मा समान।
मैं यक्ष, कुबेर, कला भी हूँ, 
रुकता और चला भी हूँ।
मैं हूँ गणेश, भृगु, राम, पार्थ, 
मुझमें ही पलता है यथार्थ।
मैं योग, ध्यान, तप, ताप, प्राण, 
मुझमें ही तू संताप जान।
पर्वत यह लता-समान देख, 
अर्जुन, मुझमें भगवान देख।
मैं वज्र, धेनु हूँ, कामदेव, 
वासुकि नाग हूँ, राम देख।


— त्रिपुरारी कुमार पांडेय 

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