कृष्ण में राधा : राधा में कृष्ण(ललित निबंध)— भगवती प्रसाद द्विवेदी

मथुरा, वृंदावन, गोकुल, नंदगाँव, बरसाने—चाहे ब्रजभूमि के किसी भी इलाके में चले जाइए, वहाँ के लोग-लुगाई एक-दूसरे का अभिवादन 'राधे-राधे' कहकर करते हुए नज़र आएँगे। क्या बूढ़े, क्या बच्चे और क्या युवा—सबकी ज़ुबान पर बस एक ही नाम—'राधे-राधे'! 'हरिर्नामैव केवलम्' की तरह। द्वापर के कृष्ण भी तो अपना नाम तक भूल गए थे और उनके भीतर-बाहर आजीवन राधारानी का ही नाम नाचता, गूँजता व प्रतिध्वनित होता रहा था।
मगर ऐसा हाल एकतरफ़ा नहीं था। 'राधे-राधे' सुनते-सुनते राधा भी अपनी सुध-बुध खो बैठती थीं और कृष्ण की गुहार लगाते हुए उनकी ज़ुबान पर भी अनायास 'राधे-राधे' का संबोधन ही आ जाता था। फिर तो कृष्ण की ज़ुबान पर भी 'राधे-राधे' और राधा के अधरों पर भी 'राधे-राधे'! कैसा अनूठा और सच्चा समर्पण था दोनों का एक-दूसरे के प्रति! एक-दूसरे के प्रति अजीबोगरीब संबोधन, फिर अपनी ही हरकत पर शरमाते श्याम और सकुचातीं-लजातीं राधा। आग दोनों तरफ़ बराबर लगना इसी को तो कहते हैं। एक कवि ने भी क्या ख़ूब कहा है—
ऐसी हुई अनहोनी सखी,
अपनी छवि न पहिचानत राधा।
राधा ही राधा राधा पुकारे,
कृष्ण पुकारत राधा राधा!
सचमुच वैसी अनहोनी अन्यत्र कहीं नज़र नहीं आएगी। प्रिय अपना अस्तित्व भूल जाए और स्वयं में भी प्रिय का ही अहसास हो। जिस तरह से तुलसी बाबा ने समूचे संसार को 'सियाराममय' मानते हुए हाथ जोड़कर प्रणाम करने का आह्वान किया था, वैसे ही इस शाश्वत प्रेम को ब्रजवासियों ने 'राधामय' मानते हुए 'राधे-राधे' के अभिवादन की अनोखी परंपरा की नींव डाली और वह आज भी बरकरार है।
ज़ुबान पर 'राधे-राधे' और अंतस् में 'कृष्ण-कृष्ण'!
उस लीलाधारी की लीला कितनी अपरंपार थी! तमाम गोपियों को उद्धव बाबा ज्ञान के उपदेश देते रहे, मगर उनके भारी-भरकम ज्ञान पर गोपियों का कृष्ण-प्रेम भारी पड़ गया था। दूसरी ओर कृष्ण का संपूर्ण समर्पण राधा के प्रति बना हुआ था। ऐसा कि वह ख़ुद को ही राधा समझने लगे थे। तभी तो 'लीलापुरुषोत्तम' कहलाए।
कृष्ण वैसे ही महान नहीं थे। उनका नाम कृष्ण 'कृष' धातु से बना था जिसका अर्थ है चुंबक-सा आकर्षित करना। यः कर्षति सः कृष्णः।' जिसका व्यक्तित्व सहज ही सबको आकर्षित कर ले, वही कृष्ण है। सिर्फ़ बाल-गोपाल, गोपिकाएँ, नर-नारी ही नहीं, यमुना नदी, गोवर्धन पर्वत, कदंब-करील के वृक्ष, गाएँ, मोर समेत तमाम चिरई-चुरुंग—सभी उनके विरल व्यक्तित्व के सम्मोहन में खिंचते चले गए थे। जो सबको कर्षित करे, वही तो कृष्ण है। सभी अवतारों में सुंदर और श्रेष्ठ—श्रीकृष्ण!
देवी-देवताओं और दुर्दांत दानवों की जद में जो रहे, वह श्रीकृष्ण। जिनकी महिमा का गुणगान पुराणों में हुआ हो, ऐसे श्रीकृष्ण। गीता के ज्ञान के ज़रिए निराश-हताश मनुष्यता में भी आशा-विश्वास का संचार करने वाले श्रीकृष्ण। भारतीय सभ्यता-संस्कृति के सिरमौर—श्रीकृष्ण!
कृष्ण न केवल बाहर हैं, बल्कि भीतर भी मौजूद हैं और अनंत काल तक अभिप्रेरणा-पुरुष बने रहेंगे। जब भी कोई विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ेगा, जब भी ऊहापोह और अनिर्णय की स्थिति बनी रहेगी, जब भी धीरज जवाब दे देगा और जब भी लक्ष्य के प्रति भटकाव और डांवाडोल के हालात बनेंगे, कृष्ण के द्वारा गीता में अर्जुन को दिए गए उपदेश नए रास्ते सुझाते रहेंगे और कृष्ण सर्वश्रेष्ठ अभिप्रेरणा-गुरु साबित होते रहेंगे। आज जितने भी दुनिया के नामी-गिरामी मेंटर हैं, सभी कहीं-न-कहीं कृष्ण से ही प्रभावित हैं। उनसे बड़ा अभिप्रेरक तो आज तक कोई पैदा ही नहीं हुआ।
ज्यों-ज्यों समय आगे सरकता जा रहा है, कृष्ण और उनके अभिनव ग्रंथ 'श्रीमद्भगवद्गीता' की प्रासंगिकता बढ़ती ही जा रही है।
कृष्ण यूँ ही अवतारी पुरुष नहीं थे। जन्म से पहले ही बाबा वसुदेव और माँ देवकी को मामा कंस ने कारागार में कैद कर रखा था। आँखें खोलते ही आँधी-तूफ़ान, अंधकार की भयावहता और यमुना में उफ़नाती बाढ़ की विभीषिका। न जाने कितने राक्षस-राक्षसियों और आततायियों से मुठभेड़। शख़्सियत को कलंकित करने की साज़िशें और युद्ध में अपनों को खोने का दंश। आख़िर में सुदर्शन चक्र भी तो उठाना पड़ा था।
किंतु कृष्ण को समझना क्या इतना आसान है? गोपियों के साथ रासलीला रचाते और छीके पर रखी मटकी फोड़ माखन चुराते कृष्ण। यमुना में स्नान करतीं गोपिकाओं के वस्त्र चुराते कृष्ण। चीर बढ़ाकर द्रौपदी की आबरू की रक्षा करते कृष्ण। गोवर्धन पर्वत को एक उँगली पर उठाकर जनता के जान-माल की सुरक्षा व इंद्र का मान-मर्दन करते कृष्ण। अंत में व्याध के हाथों इहलोक से मुक्ति पाते कृष्ण।
मगर कृष्ण का व्यक्तित्व ऐसा कि प्रतिकूलताओं में भी चेहरे पर कोई शिकन नहीं। हर पल मुस्कान बिखेरती हँसमुख सूरत। होंठों पर रखी बाँसुरी से फूटता सुरीला स्वर और टेढ़े होकर खड़े होने का अपना ही अंदाज़। प्रतिपल सौंदर्यबोध और हँसी-मुस्कान का माधुर्य। कृष्णभक्त वल्लभाचार्य ने 'मधुराष्टकम्' में लिखा भी था—
अधरं मधुरं वदनं मधुरं,
नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं,
मधुराधिपते रखिलं मधुरम्॥
जिनके मुख से माधुर्य छलक रहा है, आँखों और अधरों से मधुरता टपक रही है, जिनकी हँसी में भी मिठास है और चाल में भी। कष्टप्रद जीवन की परवाह न करते हुए बाँसुरी बजाने और प्रेमानंद के रस में सराबोर करने का नाम ही तो कृष्ण है। इसीलिए कृष्ण साधुओं, ब्रह्मचारियों, योगियों के लिए भी प्रणम्य हैं और चोरों, कामियों के लिए भी। एक कवि ने तो यहाँ तक कहा था कि जैसे आप माखन चुराया करते हैं, गोपिकाओं के वस्त्र चुराया करते हैं, वैसे ही मेरे कई जन्मों के पाप चुरा लीजिए—
व्रजे वसंतं नवनीतचौंर,
गोपांगनानां च दुकूलचौंरम्।
अनेकजन्मार्जितपापचौंर,
चौराग्यगण्यं पुरुषं नमामि॥
कृष्ण के माधुर्य में राधा का ही तो माधुर्य और सौंदर्यबोध निहित है, अतः राधा की भक्ति में ही कृष्ण की भक्ति समाहित है। अतः ब्रजधाम को नमन और सबको 'राधे-राधे'!


- भगवती प्रसाद द्विवेदी
सर्जना, बिस्कुट फैक्ट्री रोड, मगध आईटीआई के निकट, नासरीगंज, दानापुर, पटना-801503 (बिहार)

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