मेरे प्राण उबारो साधो (कविता) - सत्यम् दुबे 'शार्दूल'

नयन निमज्जित नंद दुआरे,
देख कन्हैया को छकते हैं!
हाड़-मांस की देह-कोष में,
कैसे प्राण-सुधा पकते हैं!

सरसिज-सरसिज विकस रहे हैं,
तंत्र-तड़ाग न मारो साधो!

वायस-गिद्ध साथ में खेलें,
सिंह सिक्त है चारण-धन से!
प्रमुदित हो गोपाएँ उछलें,
सुख पूछो यह मेरे मन से!

अभी-अभी तो शुरू हुआ है,
अभी डोर मत डारो साधो!

यह क्या, क्यों अक्रूर-आगमन?
मथुरा के राजा ने भेजा!
लोग चकित हो बैठे सुनकर,
लेकर जाने का संदेशा!

गोप-सखा सब हतप्रभ बैठे,
इनका कष्ट निवारो साधो!

मेरे प्राण उबारो साधो!


— सत्यम् दुबे 'शार्दूल'
(प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश)

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