आत्म-प्रदर्शन बहुत बढ़ गया,
पग-पग आज दिखावा है।
"जो दिखता है वो बिकता है",
यह तो एक छलावा है!
सहज भाव से जीवन चलता,
सहज भाव से बहती पवन।
सहज भाव से धरती चलती,
सहज भाव से गतिमान गगन।
सहज सत्य है इस जीवन का,
बाकी सब भुलावा है।
"जो दिखता है वो बिकता है",
यह तो एक छलावा है!
सूर्य कहाँ कहता जग से कि—
"देता हूँ मैं ताप प्रखर"?
आत्म-प्रदर्शन कहाँ कर रहे—
पवन, सुमन, सरिता, निर्झर?
साधक मौन गुफा में बैठे,
भीड़ जुटाता बाबा है!
"जो दिखता है वो बिकता है",
यह तो एक छलावा है!
सहज साधना अंतः की है,
सूक्ष्म लोक का सहज सफ़र।
जीवन की सच्ची उन्नति है—
लोक नहीं, लोकोत्तर!
करो आत्म का अवलोकन अब,
क्या काशी, क्या काबा है!
"जो दिखता है वो बिकता है",
यह तो एक छलावा है!
- अर्जुन प्रभात
कवि,लेखक , समीक्षक
पद्य और गद्य की दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित।
मंदाकिनी जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका का लंबे समय तक संपादन।
संप्रति - एक इंटरमीडिएट कॉलेज में प्राचार्य ।