सिंहासन और बाँसुरी (कहानी) - डॉ. प्रीति सुमन

बहुत समय पहले की बात है। एक समृद्ध राज्य पर एक बूढ़ा और अत्यंत घमंडी राजा शासन करता था। उसकी आँखों में अहंकार की ऐसी पट्टी बँधी थी कि उसे अपनी सत्ता और इकलौते बेटे के अलावा कुछ और दिखाई नहीं देता था। सत्ता के नशे में चूर राजा की जान अपने इकलौते पुत्र में बसती थी। राजा का सपना था कि वह हर हाल में उसी को अगला राजा बनाए। लेकिन राजा की इसी अँधी ममता और बेहिसाब लाड़-प्यार ने राजकुमार को पूरी तरह बिगाड़ दिया था। वह न केवल अयोग्य और मूर्ख, बल्कि अत्यंत क्रूर और संवेदनहीन भी बन चुका था। प्रजा मन ही मन उससे घृणा करती थी और उसकी क्रूरता से थर-थर काँपती थी, लेकिन राजा के खौफनाक डर के आगे सब बेबस और चुप थे।

उसी राज्य के एक शांत, छोटे से कोने में एक साधारण बाँसुरी वाला रहता था। वह अत्यंत निर्धन था, फटे-पुराने कपड़े पहनता था और केवल अपनी बाँसुरी की धुन सुनाकर अपना पेट भरता था। राजनीति, सत्ता की साजिशों या महल की चकाचौंध से उसे कोई सरोकार नहीं था। लेकिन उसकी बाँसुरी में ऐसा ईश्वरीय जादू था कि जो भी उसे सुनता, अपने सारे दुख-दर्द, भूख और प्यास भूलकर मंत्रमुग्ध हो जाता था। लोग कहते थे कि उसकी बाँसुरी की धुन साक्षात स्वर्ग का संगीत है।

धीरे-धीरे उस गरीब बाँसुरी वाले की ख्याति पूरे देश में बिजली की तरह फैल गई। लोग जगह-जगह उसकी सादगी और उसकी अद्भुत कला की दिल खोलकर प्रशंसा करने लगे। यह प्रशंसा अहंकारी राजा के कानों तक पहुँची, तो उसका अहंकार तिलमिला उठा। उसे इस बात का गहरा मर्मान्तक दुख होने लगा कि एक राजा होकर भी उसे अपनी प्रजा से वह सम्मान और निश्छल प्रेम कभी नहीं मिला, जो एक फकीर जैसे बाँसुरी वाले को मिल रहा था। साथ ही, यह भी चिंता हुई कि कहीं प्रजा राजकुमार के बदले बाँसुरी वाले को न राजा बनाने की माँग करने लगे।
असुरक्षा और गहरी ईर्ष्या के मारे राजा अपने एकांत कक्ष में बेचैनी से टहलते हुए सोचने लगा:
राजा: "यह कैसी विडंबना है! पूरे राज्य का निर्विवाद स्वामी मैं हूँ, और प्रजा इस कंगाल, दरिद्र के सुरों पर झूम रही है? अगर इस साधारण व्यक्ति की प्रसिद्धि इसी तरह बढ़ती रही, तो कल को मेरी भोली-भाली प्रजा मेरे बेटे को स्वीकार ही नहीं करेगी। अयोग्य तो मेरा पुत्र है, लेकिन राजा तो वही बनेगा, यही नियति है! मुझे इस बाँसुरी वाले का नामो-निशान मिटाना ही होगा, ताकि मेरा बेटा सुरक्षित रहे।"
एक रात, जब पूरी दुनिया सो रही थी, राजा ने चुपचाप भेष बदला और उस गरीब की झोपड़ी में गया। उसने उस बाँसुरी वाले की सबसे प्रिय बाँसुरी, जो उसके पूर्वजों की आखिरी निशानी थी और जिसमें उसकी कला की आत्मा बस्ती थी, निर्दयता से तोड़ दी। राजा ने टूटी बाँसुरी को देखकर कुटिलता से मुस्कुराते हुए सोचा:
राजा: "न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी! अब न तेरी वह मोहक धुन गूँजेगी और न लोग तुझे याद रखेंगे। तेरी कला का अंत यही है।"
सुबह जब युवक ने अपनी टूटी बाँसुरी देखी, तो उसका दिल तार-तार हो गया। वह फूट-फूटकर रोया, क्योंकि उसकी बाँसुरी नहीं, उसकी विरासत और उसकी आत्मा का हिस्सा टूट गया था। लेकिन जो सच्ची कला होती है, वह साधनों की मोहताज नहीं होती। जब उसकी बाँसुरी नहीं रही, तो युवक ने अपने असीम विरह और दुख को मार्मिक शब्दों में पिरोकर गली-गली घूमकर गाना शुरू कर दिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दर्द था, जो सीधे लोगों के दिलों को छू गया। उसकी लोकप्रियता पहले से भी कई गुना ज़्यादा बढ़ गई। लोग अब उसके संगीत के साथ-साथ उसके दुख में भी शामिल हो गए।
यह देखकर राजा बौखला उठा और पागलपन की हद तक क्रोधित हो गया। उसने बाँसुरी वाले को हमेशा के लिए खत्म करने की एक बेहद गुप्त और क्रूर योजना बनाई। उसने अपने मूर्ख और नासमझ बेटे को भी इस षड्यंत्र का सच नहीं बताया, क्योंकि उसे डर था कि राजकुमार अपनी नासमझी में सब कुछ उगल न दे।
राजा ने राजकुमार से एक कपटपूर्ण प्रेम जताते हुए कहा:
राजा: "पुत्र! वह बाँसुरी वाला गा-गाकर बहुत उड़ रहा है और हमारी बदनामी कर रहा है। तुम उससे मित्रता का ढोंग करो और उसे महल में भोजन पर आमंत्रित करो। हम दुनिया को दिखाएंगे कि हम कितने बड़े कला प्रेमी हैं और कला का सम्मान करना जानते हैं।"
राजकुमार, जो पिता की इस गहरी कूटनीति से पूरी तरह अनजान था, बाँसुरी वाले के पास गया। बाँसुरी वाला निष्कपट और सरल था, उसने राजकुमार की बात पर भरोसा कर लिया और महल में भोजन का निमंत्रण स्वीकार कर लिया।
भोजन के दिन, राजा चुपके से रसोईघर में गया और रसोइये को ज़हर की एक छोटी शीशी देते हुए फुसफुसाया:
राजा: "सुनो, जो थाली उस बाँसुरी वाले के सामने रखी जाए, उसमें यह ज़हर मिला देना। याद रहे, राजकुमार को इस बात की भनक तक नहीं लगनी चाहिए, वरना तुम अपनी जान से हाथ धो बैठोगे।"
लेकिन रसोइया एक संवेदनशील और धर्मी इंसान था। वह उस कलाकार के संगीत का बहुत बड़ा मुरीद था और अपने अहंकारी राजा की क्रूरता से अच्छी तरह वाकिफ था। उसका ज़मीर एक निष्पाप, निर्दोष कलाकार की हत्या में साझीदार बनने को कतई तैयार नहीं हुआ। वह राजा से डरता था, लेकिन एक निर्दोष की हत्या करना उसे ज़्यादा बड़ा अपराध लगा।
भोजन शुरू होने से ठीक पहले, जब बाँसुरी वाला हाथ धोने गया, तो रसोइया चुपके से और कांपते हुए उसके पास पहुँचा।
रसोइया (कांपती आवाज़ और डरी हुई आँखों में): "भाई! आज तुम्हारी जान पर बहुत बड़ा संकट है। राजा ने तुम्हारी थाली में ज़हर मिलवाया है। तुम वह भोजन मत छूना, वह मौत का भोजन है।"
बाँसुरी वाला (स्तब्ध होकर): "अरे! पर मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है? मैं तो बस अपने सुरों से लोगों के दुख कम करता हूँ। अगर मैंने भोजन करने से मना किया तो राजा मुझे अपमान के अपराध में मार डालेगा।"
रसोइया: "घबराओ मत, हिम्मत से काम लो। मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम सीधे मना मत करना। जब भोजन पर बैठो, तो अपनी थाली छूना भी मत। तुम राजकुमार से कहना कि 'मित्र! आज हमारी मित्रता का एक अनूठा प्रतीक बनाते हैं। सच्ची आत्मीयता और प्रेम का परिचय तो तब होगा जब हम अपनी थालियाँ बदलकर भोजन करें।' तुम बस अपनी थाली बदलकर उसकी थाली से खा लेना। अपनी जान बचाने के लिए तुम्हें यही करना होगा।"
बाँसुरी वाले ने रसोइये की बात को गाँठ बाँध ली। वह अपनी जान बचाने के लिए विवश था।
भोजन कक्ष में सोने की थालियाँ सजी हुई थीं। राजा दूर बैठा कुटिलता से सब कुछ देख रहा था और अपने बेटे को एक 'कठपुतली' समझकर उस पर नियंत्रण करने का गर्व कर रहा था, जबकि अज्ञानी राजकुमार अपनी थाली के सामने बैठा मुस्करा रहा था, उसे लग रहा था कि यह सब उसकी कला का सम्मान है।
जैसे ही भोजन शुरू होने लगा, बाँसुरी वाले ने बड़ी सादगी और हाथ जोड़कर राजकुमार से कहा:
बाँसुरी वाला: "राजकुमार भाई! आज एक निर्धन कलाकार को आपने जो सम्मान दिया है, उससे मेरा हृदय गद्गद है। मैं इस पल को कभी नहीं भूलूँगा। लेकिन मेरी एक छोटी सी, अंतिम अभिलाषा है। हमारी लोक-परंपरा में माना जाता है कि सच्चे मित्रों में कोई भेद नहीं होता। हमारी इस नई, ऐतिहासिक मित्रता और प्रेम के यादगार प्रतीक के रूप में, क्या हम अपनी थालियाँ बदलकर भोजन ग्रहण कर सकते हैं? आप मेरी थाली से खाएं और मैं आपकी थाली से। यह हमारी मित्रता को और भी गहरा बनाएगा।"
अहंकारी राजकुमार को लगा कि यह तो उसकी चाटुकारिता हो रही है और बाँसुरी वाला उससे अपनी कला का समर्पण कर रहा है। अपनी चरम अज्ञानता में कि किस थाली में क्या है, उसने हंसते हुए और घमंड से कहा:
राजकुमार: "हाँ-हाँ, क्यों नहीं मित्र! आज हमारी इस ऐतिहासिक मित्रता की मिसाल पूरा राज्य देखेगा और हमारी कला का लोहा मानेगा।"
दोनों ने अपनी थालियाँ बदल लीं। बाँसुरी वाले ने राजकुमार की सुरक्षित थाली से भोजन उठाया, और अज्ञानी राजकुमार ने बाँसुरी वाले की ज़हरीली थाली से पहला निवाला उठाकर अपने मुँह में डाल लिया।
कुछ ही पलों में ज़हर ने अपना घातक काम कर दिया। राजकुमार का शरीर तड़पने लगा, उसका मुँह नीला पड़ गया, मुँह से झाग निकलने लगा और देखते ही देखते उसकी आँखें पथरा गईं। वह एक निष्प्राण शरीर बनकर गिर पड़ा।
यह दृश्य देखते ही राजा की चीख निकल गई। उसकी आत्मा तक कांप गई। जिस इकलौते पुत्र के लिए उसने यह सारा पाप रचा था, वही उसके अपने षड्यंत्र का शिकार हो चुका था। राजा पागलपन की स्थिति में अपनी तलवार निकालकर चिल्लाया:
राजा: "छली! तूने मेरे बेटे को मार डाला! मैं तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा!"
राजा तलवार लेकर बाँसुरी वाले की तरफ़ झपटा। बाँसुरी वाला अपनी जान बचाने के लिए पीछे हटा। राजा अंधाधुंध तलवार चलाता हुआ आगे बढ़ा, लेकिन अत्यधिक क्रोध और हड़बड़ाहट में उसका पैर महल की खुली अट्टालिका (बालकनी) की संगमरमर की सीढ़ियों पर फिसल गया। राजा अपना संतुलन खो बैठा और सीधे सैकड़ों फीट नीचे पत्थरों पर जा गिरा, जहाँ उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
जब रसोइये ने राजसभा और प्रजा के सामने आकर पूरी सच्चाई का खुलासा किया कि कैसे राजा ने अपनी ईर्ष्या में ज़हर मिलवाया था और अपने ही जाल में फँसकर अपने पुत्र को खो बैठा, तो पूरी प्रजा सन्न रह गई।
प्रजा ने देखा कि एक तरफ सत्ता का अंधा अहंकार और कुटिलता थी जिसने अपने ही कुल का नाश कर लिया, और दूसरी तरफ एक निष्पाप, स्वाभिमानी कलाकार था जिसे ईश्वर ने हर संकट से बचाया। प्रजा ने देखा कि कर्म का सिद्धांत कैसे काम करता है - राजा ने जो ज़हर बाँसुरी वाले के लिए तैयार किया था, वह उसी के घर में लौट आया।
प्रजा ने एक स्वर में निर्णय लिया और उस साधारण बाँसुरी वाले को राज्य का नया राजा चुन लिया। इस प्रकार, एक अहंकारी और क्रूर राजा का अंत हुआ और एक न्यायप्रिय, कलाप्रेमी शासन की शुरुआत हुई, जहाँ सुरों की गूँज हमेशा बनी रही।


- डॉ. प्रीति सुमन 
सीतामढ़ी, बिहार 

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका