मैं नहीं हूँ
तुम्हारी तरह
इतना गिरा हुआ
कि सच छोड़ दूँ,
झूठ की ख़ातिर।
भीड़ देखकर
रास्ता बदल लूँ,
सुविधा पाकर
विचार बदल लूँ।
नहीं,
मैं नहीं हूँ
तुम्हारी तरह
इतना गिरा हुआ कि
झूठ के आगे
सिर झुकाऊँ,
सत्य पर
कीचड़ उछालूँ,
अपने ही शब्दों का
गला दबाऊँ...
अपने ही विश्वासों को
बेच खाऊँ।
नहीं,
मैं नहीं हूँ
तुम्हारी तरह
इतना गिरा हुआ।
सच धूप भी है,
सच आँधी भी है।
सच काँटा भी है,
सच चंदन भी है।
पर सच,
सच ही रहता है—
हर मौसम में,
हर क़ीमत पर।
इसलिए
मैं चुनता हूँ
सच का पक्ष।
भले अकेला रहूँ,
भले ठुकराया जाऊँ,
पर,
झूठ का साथी
नहीं बनूँगा।
क्योंकि
गिरने से पहले
मर जाना बेहतर है।
और मैं
अभी जीवित हूँ,
सत्य के साथ।
-तेज नारायण राय
ग्राम -कुल्हड़िया पोस्ट -भैरवपुर
थाना जामा जिला दुमका
झारखंड