'माँ! मास्टर साहब कह रहे थे कि दो दिनों में फीस नहीं जमा की तो नाम काट दिया जाएगा। यह अंतिम अवसर दिया जा रहा है।'
छः वर्षीय चन्दन ने अपनी माँ राधा से यह बात बताई।
'क्या करूँ बेटा? हड़ताल चल रही है, ठेकेदार पैसे नहीं दे रहा है। मास्टर जी से कहना कि माँ जल्दी ही फीस जमा कर देगी पर स्कूल से न निकालें।'
राधा के मन में बेचैनी थी, आखिर वह करे तो क्या करे?
राधा उन सैकड़ों सफाई कर्मियों में से एक थी जो एक ठेकेदार के माध्यम से शहर के एक प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में सफाई का कार्य करते थे। ठेकेदार इन सफाई कर्मियों का भरपूर शोषण करता था। शोषण से पीड़ित इन लोगों ने एक स्थानीय राजनेता से संपर्क किया और अपनी सारी व्यथा कह डाली। फिर क्या था, नेता जी को तो मुद्दा चाहिए था। चल पड़े इनका साथ देने। पहले तो चिकित्सा संस्थान के प्रशासन को चुनौती दी, ठेकेदार को चेतावनी दी, सफाई कर्मियों को ललकारा और एक दिन अचानक ही हड़ताल करवा दी। सफाई कर्मियों के सुलगते असंतोष में नेता जी की सक्रियता ने आग में घी का काम किया। ऑपरेशन टलने लगे, भर्ती रोगियों की छुट्टी की जाने लगी। जगह-जगह दुर्गंध के साथ-साथ पूरे चिकित्सालय परिसर में गंदगी के ढेर लगने लगे। जब स्थिति नियंत्रण के बाहर हो गई और चर्चा बाहर तक पहुँची, तो प्रशासन के कान खड़े हुए।
चिकित्सा अधीक्षक ने ठेकेदार से कहा—
'ये लोग काम पर नहीं लौटते तो इन्हें हटाकर नए लोगों को लाइए। अस्पताल बंद होने की स्थिति में पहुँच गया है और अब तो बात सरकार तक पहुँच गई है।'
'महोदय! एक साथ तीन सौ लोगों को निकालना और फिर इतने ही लोगों की आनन-फानन में भर्ती करना आसान नहीं है। इस निर्णय का नेता जी लाभ उठाकर मुझे और आपको परेशानी में डाल सकते हैं। साथ ही, सफाई कर्मियों के हक का वास्ता देकर स्थिति अनियंत्रित करवा सकते हैं और बात बनने के बजाय और बिगड़ सकती है। मैं शीघ्र से शीघ्र कोई रास्ता निकालने की कोशिश करता हूँ। उम्मीद नहीं थी कि यह हड़ताल ऐसी स्थिति में पहुँच जाएगी।'
ठेकेदार ने अपनी बात रखी।
हड़ताल का आज चौथा दिन था। सफाईकर्मी अब परेशान होने लगे क्योंकि अभी पिछले महीने का वेतन भी नहीं मिला था। न हड़ताल टूटी और न ही चन्दन फीस दे पाया। इसी डर से वह स्कूल भी नहीं गया, बल्कि माँ से हठ करने लगा कि मुझे भी साथ ले चलो—मैं भी देखूँगा कि हड़ताल क्या होती है?
राधा जब चन्दन के साथ चिकित्सालय पहुँची तो आज का दृश्य कुछ भिन्न था। एक ओर नेता जी सफाई कर्मियों को एकत्र कर हाय-हाय और मुर्दाबाद के नारे लगवा रहे थे, तो दूसरी ओर चिकित्सा अधीक्षक सभी चिकित्सकों, अधिकारियों और कर्मचारियों को संबोधित कर रहे थे—
'साथियों, हम इस हड़ताल के दबाव में नहीं आएँगे और रोगियों की सेवा बाधित नहीं होने देंगे। हम सभी अपने-अपने घरों में साफ-सफाई करते ही हैं। आज हम अपनी कर्मस्थली को भी साफ-सुथरा रखने का दायित्व निभाएँ। आइए! हम समाज को और हड़तालियों को दिखा दें कि जरूरत पड़ने पर बिना किसी संकोच और शर्म के हम झाड़ू भी उठा सकते हैं।'
इतना कहना था कि कुछ चापलूसों ने तुरंत झाड़ू की व्यवस्था की और कई लोगों को पकड़ा भी दिया। लोग अनमने ढंग से इधर-उधर झाड़ू चलाने लगे। स्वयं चिकित्सा अधीक्षक महोदय भी झाड़ू से कागज, रुई के छोटे टुकड़ों और थोड़ी-बहुत धूल एवं गर्द साफ करने लगे। देखा-देखी अन्य अधिकारी और कर्मचारी भी चापलूसी का झाड़ू चलाने लगे। ज्यों ही यह नाटक शुरू हुआ, मीडियाकर्मी कैमरे में यह अद्भुत दृश्य कैद करने लगे। रिपोर्टर अपने-अपने कार्यालयों को फोन करने लगे—'एक बड़ी खबर... चिकित्सा अधीक्षक और उनके सहकर्मियों ने मिसाल कायम की और समाज को एक अनोखा एवं अनुकरणीय संदेश दिया है...।'
राधा के साथ-साथ चन्दन भी यह सब देख रहा था और कुछ चकित-सा होता हुआ पूछ बैठा—
'माँ! सबकी फोटो क्यों खींची जा रही है?'
'बेटा! वे बड़े साहब लोग हैं और झाड़ू लगा रहे हैं, इसलिए फोटो खींची जा रही है। फिर यह सब अखबारों में छपेगा, टीवी पर दिखाया जाएगा।'
चन्दन अपनी माँ की बातों की गहराई को भला क्या समझता! सहज भाव से पूछ बैठा—
'माँ! तुम भी तो इतने दिनों से झाड़ू लगा रही हो, फिर तुम्हारी फोटो कभी क्यों नहीं खींची गई?'
'अरे बेटा! फोटो बड़े लोगों की खींची जाती है और हम लोग तो...।'
राधा वाक्य पूरा नहीं कर पाई।
'माँ! माँ! अब मैं भी स्कूल नहीं जाऊँगा। मैं भी बड़ा होकर झाड़ू लगाऊँगा, तभी तो बड़ा साहब बनूँगा। फिर मेरी भी फोटो खींची जाएगी, टीवी पर दिखाई जाएगी, अखबारों में भी मेरी फोटो छपेगी। है ना माँ?'
चन्दन जोश में आ गया था।
राधा यह सब सुनकर हतप्रभ रह गई। उसने एकाएक चन्दन को अपने कलेजे से लगा लिया। सिसकते हुए बोली—
'कैसे समझाऊँ बेटा तुझे?'
वह घर लौट आई। देर रात तक सोचती रही—ईश्वर उन्हीं लोगों की परीक्षा लेता है जो विवश हैं, और यह विवशता क्या हमने जान-बूझकर चुनी है? यह विवश जीवन तो उसी ईश्वर का ही दिया हुआ है, जिसे भाग्य समझकर स्वीकार करने के सिवाय हमारे पास दूसरा और कोई रास्ता नहीं है।
इसी अंतर्द्वंद्व में वह चन्दन को लेकर अगले दिन स्कूल पहुँची।
उसे देखकर मास्टर जी ने सोचा, शायद वह फीस जमा करने आई होगी। बोले—
'अंतिम तिथि तो बीत चुकी। अब तो प्रिंसिपल साहब से मिलना पड़ेगा।'
'मास्टर जी! यदि आप मेरी बात सुन लेते तो बड़ी कृपा होती।' और राधा ने सारी कथा सुना डाली। अंत में उसने कहा—'मास्टर जी! पति के गुजरने के बाद मैं वर्षों से सफाई का काम करके परिवार चला रही हूँ। न जाने कितने रोगियों के मल-मूत्र धोए। थूक, लार, खून, घाव और मवाद इन्हीं हाथों से पोंछती हूँ। फर्श चमकाई, दीवारें साफ कीं, ब्लीचिंग पाउडर से हाथ खराब हो चुके हैं, न जाने कितने और कैसे-कैसे रोग लग चुके होंगे Master जी! पर आज तक किसी ने हमारे जैसे लोगों की न तो फोटो खींची और न ही किसी अखबार में हमारे बारे में किसी ने सहानुभूति के दो शब्द ही लिखे, क्योंकि हम छोटे लोग हैं। झाड़ू और पोंछे के पीछे की पीड़ा चन्दन नहीं समझ सकता। वह तो समझता है कि बड़ा आदमी वही है जो झाड़ू लगाता है और तभी फोटो भी खींची जाती है। मास्टर जी! दया कर कुछ दिनों की मोहलत और दे दीजिए, स्कूल से चन्दन का नाम मत काटिए; नहीं तो सचमुच वह जिंदगी भर झाड़ू ही लगाएगा।'
इतना कहते-कहते राधा रो पड़ी। यह रुलाई चन्दन के भविष्य को लेकर थी या राधा अपनी विवशता पर रो रही थी या फिर हमारी सामाजिक (कु)व्यवस्था और संवेदनहीनता के कारण उसकी आँखों में ये आँसू उपजे थे—कहना कठिन था।
मास्टर साहब द्रवित हो उठे। राधा को लेकर प्रिंसिपल महोदय के पास पहुँचे, पूरी बात बताई और बोले—
'सर! ऐसी करुण परिस्थिति में भी यदि इनकी सहायता के लिए कोई आगे नहीं आया, तो फिर हमें यह कहने का कोई अधिकार भी नहीं होगा कि आज के बच्चे कल का भविष्य हैं। सर! इस महीने की फीस मैं जमा कर देता हूँ—संभव है अगले महीने कोई और आगे आए।'
प्रिंसिपल महोदय कुछ देर शांत बैठे सोचते रहे, फिर बोले—
'माथुर साहब! कभी-कभी हम उन अध्यायों को स्वयं नहीं पढ़ते जो जीवन भर दूसरों को पढ़ाते रहते हैं। आप फीस जमा कीजिए, अगले महीने मैं यह दायित्व लेता हूँ—उसके बाद कोई न कोई अवश्य आएगा, संभव है तब तक हड़ताल खत्म ही हो जाए।'
राधा की आँखों में अब भी आँसू थे, पर ये खुशी के आँसू थे। उसे विश्वास हो चला कि अब उसका चन्दन झाड़ू नहीं लगाएगा, बल्कि 'चन्दन' की तरह सुगंध बिखेर सकेगा।
- डॉ. राम प्रमोद मिश्र
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