प्रतिक्रिया (लघुकथा) - आलोक चोपड़ा

साँपों के सरदार ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई। सरदार ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "आज हम लोगों की संख्या और पहचान बड़ी तेज़ी से घटती जा रही है।"

तभी भीड़ से एक युवा साँप ने क्रोध में फुंकारते हुए कहा, "खत्म तो होनी ही है सरदार! हम रहें तो कहाँ रहें? जंगल-के-जंगल काटकर स्मार्ट सिटी बनाए जा रहे हैं। विरोध करने का अब हमारे पास एक ही उपाय बचा है कि हम इंसानों को काटें। पर किसे काटें और कहाँ डसें? हमसे अच्छा तो आज यह काम इंसान ही..."


 
- आलोक चोपड़ा 
  चोपड़ा हॉउस 
     धर्मशाला गली 
       चौक पटना सिटी 
          पटना 800008 
शिक्षा :---बी0 कॉम, एल0 एल0 बी0,संगीत प्रभाकर, प्रयाग संगीत समिति इलाहबाद एवं बी0 एफ0 ए0 चंडीगढ़। 
देश विदेश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लघुकथा का प्रकाशन।
 हिंदी के आलावा उर्दू, बंगला, उड़िया, नेपाली आदि भाषा में मेरी रचनाओं का अनुवाद व प्रकाशन।

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