कमी मोहन की राधे को खली है(ग़ज़ल) - सूरज तिवारी

कमी मोहन की राधे को खली है,
हुई बेचैन बेहद बावली है।

न पौरुष को कभी आँका मुरारी,
जवानी राधिका की बस ढली है।

निहारे राधिका पथ कब तलक यूँ,
जतन से कंटकों पर चल चली है।

बजाते चैन की बंसी कन्हैया,
कभी ये बावली पीछे चली है।

न छोड़ो बीच राहों में कन्हैया,
किसी के बाग़ की नाज़ुक कली है।


— सूरज तिवारी
भदोही, उत्तर प्रदेश


एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका