कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से टकराया और रिया गुस्से में हाँपती हुई अंदर दाख़िल हुई। आँखों में बहते आँसू और दिल में कड़वाहट लिए उसने अपना बैग ज़मीन पर पटका।
"माँ! अब मैं उस घर में दोबारा कभी कदम नहीं रखूँगी। उन्होंने मुझसे ऐसे कैसे बात कर ली, वो भी चिल्ला-चिल्लाकर? मैंने भी मुँह पर करारा जवाब दिया और सीधे यहाँ चली आई। अब मुझे वहाँ जाना ही नहीं है!" रिया का गला गुस्से और दर्द से रुँध गया था।
“क्यों बेटा?” माँ ने शांत स्वर में पूछा।
"उनको मेरे काम के बारे में नहीं बोलना चाहिए था, मेरा काम है अपनी चीज़ों को मैं ज़्यादा जानूँगी कि वह! और मुझे सलाह दे रहे थे कि ऐसे करना चाहिए, वैसे करना चाहिए।"
माँ कुछ पल चुप रही। चाय बनाई, रिया को शांत होने दिया और साथ में चाय पीने बैठ गई। फिर उसने रिया का हाथ अपने हाथों में लिया और बोली—
“बेटा, गुस्से में लिया गया फ़ैसला हमेशा सही नहीं होता। हर रिश्ते में कभी न कभी कड़वे शब्द आ जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि रिश्ता ही छोड़ दिया जाए।”
रिया बोली, “लेकिन माँ, मैं क्यों सहूँ?”
माँ मुस्कुराई।
“सहने की बात नहीं कर रही हूँ। समझने और समझाने की बात कर रही हूँ।”
फिर माँ ने पूरे घर की ओर देखते हुए कहा—
“देख बेटा, मैंने इस घर को केवल ईंट-पत्थरों से नहीं बनाया। मैंने इसे वर्षों की लगन, समर्पण और प्यार से सँवारा है। इस घर की एक-एक चीज़ को संभाला, उसकी क़दर की। तुम्हारे पिता की छोटी-सी पसंद से लेकर तुम्हारी बचपन की चीज़ों तक, मैंने हर सामान में भावनाएँ देखीं। क्योंकि मुझे पता था कि घर केवल चीज़ों से नहीं, उन चीज़ों से जुड़ी भावनाओं से बनता है। हर घर एक भावनाओं का संसार होता है, सिर्फ़ घर नहीं होता।”
रिया चुपचाप माँ की बात सुनती रही।
माँ ने आगे कहा—
“वैसे ही विवाह भी केवल पति-पत्नी का एक साथ रहना नहीं है। वहाँ भी एक-एक शब्द, एक-एक व्यवहार और एक-एक भावना की क़दर करनी पड़ती है। तुम अपने सम्मान से समझौता मत करना, लेकिन सामने वाले के सम्मान की भी क़दर करना सीखो। ग़लती हो तो समझाओ, अपनी ग़लती हो तो स्वीकार करो। और हाँ, अगर कभी कोई बात बहुत ग़लत हो, तो चुपचाप सहना भी ज़रूरी नहीं, बल्कि मिलकर उसका समाधान खोजो।”
रिया की आँखों में आँसू आ गए।
“तो माँ, मैं वापस चली जाऊँ?”
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“हाँ बेटा, घर लौटने के लिए नहीं, अपना घर बचाने के लिए जाओ। लेकिन इस बार गुस्सा नहीं, समझदारी साथ लेकर जाना। रिश्तों की तरह चीज़ों की भी क़दर करना सीखो, क्योंकि जो चीज़ें और रिश्ते हमें आसानी से मिल जाते हैं, उनकी असली क़ीमत अक्सर तब समझ आती है जब वे हमसे दूर होने लगते हैं।”
रिया उठी, माँ के गले लग गई और बोली—
“माँ, आज आपने मुझे सिर्फ़ ससुराल नहीं, रिश्ते निभाना सिखाया है।”
माँ मुस्कुराई।
“बस बेटा, याद रखना कि घर सजाने के लिए सामान चाहिए, लेकिन घर बसाने के लिए समझ, सम्मान और समर्पण।”
माँ के इन गहराई भरे शब्दों ने रिया के भीतर के बवंडर को शांत कर दिया। उसे समझ आ गया कि स्वाभिमान की रक्षा करने और अहंकार में रिश्ते झटक देने में कितना बड़ा फ़र्क़ होता है। उसने चुपके से अपना सिर माँ की गोद में रख दिया, यह जानते हुए कि कल की सुबह उसे एक नई समझ के साथ अपने घर वापस लौटना है।
- सुनीता
वाराणसी, उत्तर प्रदेश