कहाँ साथ निभाता है,
दुःख में भाग जाता है।
खुद से बाज़ आता नहीं,
शीशे भी तोड़ जाता है।
आकाश जगह नहीं देता,
परिंदा भी शोर मचाता है।
चल नहीं पाता पगडंडी पर,
चौराहे पर राह दिखाता है।
काम निकल आने तक,
मुझसे दोस्ती निभाता है।
कैसा आशिक़ है मेरा,
ग़लत पता बतलाता है।
हाथ-पाँव तो हैं मगर,
मुक़द्दर ज़ुल्म ढाता है।
दुश्मनों से करके दोस्ती,
दोस्तों में रंग जमाता है।
यही दस्तूर देखा 'सिद्धेश्वर',काम निकलते जग भूल जाता है।
- सिद्धेश्वर
पटना , बिहार