हसीन शाम का मंज़र भी ख़ूब हो जाए,
उदास रात का तेवर भी ख़ूब हो जाए।
चलो बुझाते हैं दरिया में प्यास जाकर हम,
भले निढाल यह सागर भी ख़ूब हो जाए।
हमारे ख़्वाब को देखा नहीं कभी उसने,
नज़र में ख़्वाब यह बेहतर भी ख़ूब हो जाए।
उसे तमीज़ न आए कभी भी पीने पर,
कभी पिए तो वह पीकर भी ख़ूब हो जाए।
हमारे साथ वह मिलकर भी काम कर ले तो,
यक़ीन मानिए दफ़्तर भी ख़ूब हो जाए।
- अविनाश बन्धु
पटना, बिहार