प्रियतम बाट निहारूँ (गीत) - ममता तिवारी 'मृदुला'

जलद-मेघ भी अब तो आया,
व्योम तिमिर घन छाया।
गरजे घम-घम, लप-लप चमके,
थर-थर काँपे काया।
हृदय-वेदना आह! कराहे,
विपिन-वीथि में पुकारूँ,
प्रियतम बाट निहारूँ...

चौमासा देहरी खड़ा है,
मीत कहाँ तू अड़ा है?
नन्हीं-नन्हीं पानी-बूंदें,
नग-तरह तन जड़ा है।
भीरु हिया, भयकारी सावन,
किस विधि मन सँवारूँ?
प्रियतम बाट निहारूँ...

बैरी पवन केश उलझाए,
उड़-उड़ मुख पर आए।
कर-कर कुंडी से खिलवाड़,
चौखट मन ले जाए।
परदेश रमा मेरा औषधि,
पीर घना पुचकारूँ,
प्रियतम बाट निहारूँ...

भँवर उठा हिय हौले-हौले,
आशा डगमग डोले।
किससे करे साझा मन-दुखड़ा,
आओ तो कुछ बोले।
छवि नैन लिए भित्ति-चित्र बनी,
मन-पट तुम्हें उतारूँ,
प्रियतम बाट निहारूँ...

— ममता तिवारी 'मृदुला'

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