ऑनलाइन (लघुकथा) - अनीता सिद्धि

पार्क की बेंच पर बैठे दादाजी ने मुस्कुराते हुए अपने पोते से कहा, "बेटा, ज़रा इधर बैठो, तुम्हें एक मज़ेदार बात सुनानी है।"
पोते ने सिर उठाए बिना जवाब दिया, "एक मिनट दादाजी, मैं ऑनलाइन हूँ।"
उसी समय सामने से एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया और ठोकर खाकर गिर पड़ा। उसके घुटने छिल गए। दादाजी तुरंत उठे, उसे संभाला, धूल झाड़ी और प्यार से चुप कराने लगे।
बच्चे की माँ आई और बोली, "बाबूजी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।"
दादाजी मुस्कुरा दिए।
यह सब देखकर पोते ने पहली बार मोबाइल से नज़र हटाई। उसने देखा—दादाजी उस अनजान बच्चे के सिर पर हाथ फेर रहे थे और बच्चा उनसे लिपटा हुआ था।
कुछ पल बाद पोता चुपचाप अपनी जगह से उठा, मोबाइल जेब में रखा और दादाजी के पास आकर बैठ गया।
दादाजी ने आश्चर्य से पूछा, "अरे! ऑनलाइन नहीं हो?"
पोते ने उनका हाथ थाम लिया—
"अब हूँ दादाजी... सही जगह ऑनलाइन हूँ।"


-अनीता सिद्धि
    पटना, बिहार 

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