भेदभाव (छंदमुक्त) - प्रसाद रत्नेश्वर

सोने के कटोरे में
लेकर दूध-भात,
कभी आया नहीं
वह चाँद...
हमारे
लोकगीतों में भी,
हुआ है
भेदभाव हमारे साथ!
पंडित का बेटा
खाता भी है,
और गाता भी है;
चाँद 'मामा' है
बस उसका!
हमारा हो भी
नहीं सकता वह,
जाति जो अलग है
हमारी!
...फिर क्या होता है
महज़ 'हमवतन' या
'इंसान' होने से!


- प्रसाद रत्नेश्वर
मोतिहारी, बिहार 

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