नारी तू धरा का बोझ नहीं(कविता) - अर्चना चौधरी

नारी तू धरा का बोझ नहीं,

धरती की सुषमा तुमसे है।

तू जननी, तू भगिनी, तू—

तू संगिनी, वीरव्रती तू!


​तू ही हो वीर धाय पन्ना!

हाड़ा रानी, पद्मावती भी,

तू गौतम की यशोधरा;

तू सत्यवान की सावित्री।


​शौर्य तेरा युग-युग से वर्णित,

पृथ्वी के प्रांगण में।

तू कर न प्रदर्शित गात आज,

जग के दुर्लोभी आँगन में।


​मर्यादा जिसकी सब गाएँ,

उस राम प्रबुद्ध की सीता हो।

अग्नि-परीक्षा देकर जो,

जग में बन गई सुगीता हो।।


​तू पृथ्वी को धारण करती,

दुष्टों का संहारण करती।

तू युगों-युगों से धात्री हो,

तू ही गीता, गायत्री हो।।


​नारी तू नर के कण-कण में,

श्वासों में तू ही समाई हो।

पौरुष भी तुमसे जाई है,

क्यों आज धरी कातराई हो।।


​अपना वह शौर्य-प्रताप लिखो,

फिर से तू नव इतिहास लिखो।

नारी-नारी का करो मान,

नव जीवन का अध्याय लिखो।।


- अर्चना चौधरी 

समस्तीपुर, बिहार 


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