नारी तू धरा का बोझ नहीं,
धरती की सुषमा तुमसे है।
तू जननी, तू भगिनी, तू—
तू संगिनी, वीरव्रती तू!
तू ही हो वीर धाय पन्ना!
हाड़ा रानी, पद्मावती भी,
तू गौतम की यशोधरा;
तू सत्यवान की सावित्री।
शौर्य तेरा युग-युग से वर्णित,
पृथ्वी के प्रांगण में।
तू कर न प्रदर्शित गात आज,
जग के दुर्लोभी आँगन में।
मर्यादा जिसकी सब गाएँ,
उस राम प्रबुद्ध की सीता हो।
अग्नि-परीक्षा देकर जो,
जग में बन गई सुगीता हो।।
तू पृथ्वी को धारण करती,
दुष्टों का संहारण करती।
तू युगों-युगों से धात्री हो,
तू ही गीता, गायत्री हो।।
नारी तू नर के कण-कण में,
श्वासों में तू ही समाई हो।
पौरुष भी तुमसे जाई है,
क्यों आज धरी कातराई हो।।
अपना वह शौर्य-प्रताप लिखो,
फिर से तू नव इतिहास लिखो।
नारी-नारी का करो मान,
नव जीवन का अध्याय लिखो।।
- अर्चना चौधरी
समस्तीपुर, बिहार
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