चाँद मुंगेरी हिंदी में लगातार और पाबंदी से ग़ज़लें कह रहे हैं। 'तलाश सूरज की', 'क्षितिज के पार', 'एक टुकड़ा धूप का' आदि उनके ग़ज़ल-संग्रह पहले से प्रकाशित हैं। इस बार उनका एक नया संग्रह 'उजाले की साजिश' के नाम से प्रकाशित हुआ है, जिसमें उनकी लगभग सौ विभिन्न तेवर की ग़ज़लें शामिल हैं।
ग़ज़लों के बारे में उन्होंने ख़ुद भी कहा है कि— "मेरे ख्याल से अच्छी ग़ज़ल वह है, जिसमें सत्य और सार्थक विचार ईमानदारी पूर्वक रखे गए हैं।" आगे वह यह भी लिखते हैं कि— "मैंने जो देखा, समझा, महसूस किया, उसी भोगे हुए एहसासात को आपके समक्ष रख दिया है।"
ज़ाहिर है, उनकी किसी ग़ज़ल में कोई बनावटीपन नहीं है, और न ख्यालों की बेवजह ऊंचाइयाँ हैं। उनकी ज़बान में हिंदीपन है, लेकिन ग़ज़ल के लहजे, गुफ्तगू और आत्मा के खिलाफ़ कोई शब्द नहीं ठूंसे गए हैं।
उनकी ग़ज़लें उन सूफियों के संसार से निकलकर आती हैं, जहाँ नफ़रत के लिए कोई जगह नहीं है। एक ऐसे समय में जब आदमी ज्यादा से ज्यादा कट्टर हो रहा है, प्रेम का संदेश पहुंचाना इस सदी का सबसे बड़ा ख़तरा है, लेकिन शायर यह काम नहीं छोड़ता। कुछ शेर आप भी देखें—
बे हया, बे अदब, बेवफ़ा के लिए,
हाथ मेरा उठा है दुआ के लिए।
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मिट रही है यहाँ आबरू प्रेम की,
वो हक़ीक़त बयाँ लाख करते रहे।
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सिर्फ जीना नहीं सर ख़ुशी के लिए,
आदमी हम बने आदमी के लिए।
उनकी ग़ज़ल की एक सबसे बड़ी ख़ूबी है कि वह हमें ख़तरों से सावधान करते हैं, हमें संसार के चरित्र से आगाह करते हैं, और कई बार हमें उस आंदोलन के लिए आमादा करते हैं, जिसके बिना हुकूमत ने हक़ न देने की रिवायत बना ली है। कुछ और शेर देखें—
सतत हमदर्दी लाचारों से रखना,
कभी रिश्ता न मक्कारों से रखना।
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आ रहे थे वो तलवार ताने हुए,
रोक उनको दिया तो ख़ता हो गई।
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जानते हैं सब कि क्या अच्छा मिला,
रौशनी के नाम पर धोखा मिला।
अपनी साज़-सज्जा और मुद्रण से भी यह पुस्तक हमें आकर्षित करती है। बहुत सारे नये काफ़िये भी यहाँ आपको पढ़ने को मिलेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी पट्टी में यह किताब लोकप्रिय होगी।
- डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री
बेगूसराय, बिहार
पुस्तक विवरण:
पुस्तक: उजाले की साजिश
विधा: ग़ज़ल
मूल्य: ₹350/- (हार्ड कवर)
पृष्ठ: 116
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, नई दिल्ली-59
समीक्षक का पता:
माफ़ी, अस्थावां, नालंदा - 803107