कविता दिल की चीख है,
वियोग इसका आधार।
यातना जब मिलती दिल को,
फूटती इसकी धार।
अपनों से आघात जब मिलता,
दिल में लगती आग।
तड़पन से क्रंदन निकलता,
जिह्वा पर बनता राग।
रावण की क्रूरता ने,
रामायण को रचवाया।
दुर्योधन के स्वार्थपन ने,
महान उपदेश दिलवाया।
पुत्र-मोह में धृतराष्ट्र ने,
युद्ध का बनाया समां।
उन जैसों का स्वार्थपन ही,
कविता को पहनाता जामा।
कवि-भगवान के बीच में,
भावों का होता संचार।
कवि जब यातना में पड़ता,
प्रभु से होता प्यार।
भाव-समुद्र भगवान में होता,
कवि है भाव-भंडारी।
दिल की चीख कवि की सुनकर,
प्रभु जताते यारी।
रसखान को कृष्ण मिले,
मीरा भी कृष्ण-दीवानी।
तुलसीदास ने राम को पाया,
खुसरो-कबीर की बानी।
सूर पर कृष्ण-कृपा बरसी,
विवेकानंद पर काली।
विद्यापति के शंकर ने,
'उगना' बन की रखवाली।
कविता क्या है अब तो सबके,
समझ में ज़रूर आया होगा।
अगर कोई लिखता है कविता,
ज़रूर कोई उसे सताया होगा।
अकारण कोई उसके दिल को,
तिल-तिल कर जलाया होगा।
उसके दिल का करुण रोदन,
कविता बनकर आया होगा।
- रामकिशोर चकवा
सीतामढ़ी, बिहार