कलाई पर बँधा धागा
सिर्फ़ धागा नहीं होता,
बँधा होता है इसमें
बचपन का स्नेह,
आँगन की खिलखिलाहट,
मुश्किलों से बचाती हुई
दो छोटी हथेलियाँ।
कलाई पर बंधी हुई राखी
सिर्फ़ सजावट नहीं होती,
विश्वास की एक गाँठ
बाँध जाती है चुपचाप वह।
बहन बचपन की साथी ही नहीं,
घर की स्मृति भी है;
उम्र के विस्तार में भी
वही बचपन खनकता है।
कलाई पर बंधी हुई राखी
एक भरोसा है—
कि जीवन की भीड़ में
कोई अपना अब भी
उसके भरोसे पर अडिग है।
राखी की एक गाँठ में
पूरा बचपन आह्लादित होता है,
मुस्कुराता है जीवन के पूरे घनत्व में।
समय बीतता जाता है पर,
विश्वास का यह धागा
संस्कार की पवित्रता को छूता रहता है।
— रमेश श्रीवास्तव
जी/2, रंजीत विला अपार्टमेंट,
मौर्या पथ, ख़ाजपुरा,
पटना - 800014