इस राखी पर (कविता) - डॉ. राम प्रमोद मिश्र

कसक इस पार भी, उस पार भी,
भीगे नैन इस पार भी, उस पार भी।
मन न जाने क्यों सोचता है बार-बार,
क्या न आएगा भाई इस बार भी?

सपने उन दोनों की आँखों में हैं,
पर नींद न इधर है, न उधर ही।
लोग कहते हैं यह बात न जाने क्यों,
जागते सपने भी पूरे हुए हैं कभी?

वह खड़ा सीमाओं पर यह सोचकर—
बहन की राखी न मिले, न सही पर,
कौन जा सकता है मेरे रहते भला,
मेरी माँ के आँचल को पार कर?

न आ पाने का उलाहना मैं क्यों दूँ?
मेरे जैसे सहस्रों भाई अकेले यहाँ।
सब कहते हैं— "बहन, तू खुश हो लेना,
किसी सैनिक भाई को राखी बाँधकर।"


— डॉ. राम प्रमोद मिश्र
   लखनऊ,  उत्तर प्रदेश 

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