मेरी आस्था दीदी ने बचपन से ही मेरी बड़ी बहन होने के साथ-साथ एक माँ की तरह मेरा ख़याल रखा। मेरी माँ के स्कूल चले जाने के बाद मेरी ज़रूरतों का ध्यान मेरी नानी और मेरी दीदी ही रखती थीं। वैसे तो मैं दीदी से सिर्फ़ पाँच साल ही छोटा हूँ, लेकिन मुझे कब किस चीज़ की आवश्यकता है, वह न जाने कैसे अच्छे से जान जाती हैं और उसे पूरा कर देती हैं। दीदी का स्कूल दूसरी पाली में होने के कारण उनके दिन का समय मेरे साथ बीतता था। वह जो भी पढ़तीं, मुझे सुनातीं और जो भी कार्य करतीं, उसके बारे में बताती जातीं। हालाँकि मैं शुरू के चार-पाँच वर्षों तक कुछ बोल नहीं पाता था, फिर भी वह मुझसे घर की, स्कूल की, अपनी, मेरी और न जाने कितनी बातें करती थीं; और मुझे भी उनसे दुनिया-जहान की बातें सुनना बहुत अच्छा लगता था। शाम को वह हारमोनियम पर जब गीत गाया करती थीं—'फूलों का, तारों का, सबका कहना है; एक हज़ारों में मेरा भैया है; सारी उमर हमें संग रहना है', तो ऐसा लगता था जैसे मैं परियों की दुनिया में पहुँच गया हूँ।
बारहवीं पास कर जब दीदी अपनी आगे की पढ़ाई करने दिल्ली चली गईं, तब मुझे राखी का दिन बहुत अधूरा-सा लगने लगा था। बिना बहन के कैसा त्योहार और घर में कैसी रौनक? राखी के दिन जल्दी से उठकर, स्नान करके तैयार हो जाना और मम्मी का यह कहना कि जल्दी से राखी बंधवा लो, नहीं तो दीदी भूखी रह जाएँगी। और फिर दीदी का मुझे तिलक लगाना, आरती उतारना, मिठाई खिलाना और कलाई पर राखी बाँधते हुए यह गुनगुनाना कि—'बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बाँधा है; प्यार के दो तार से संसार बाँधा है', कितनी आनंदमय अनुभूति होती है! और फिर दीदी का मेरी लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन की मंगलकामना करते हुए यह कहना कि 'मैं तुम्हें सबकी बुरी नज़र से बचाऊँगी और कभी कोई मुश्किल आए तो मैं हूँ न'। सच में, उनके ये शब्द अंदर तक मुझमें ऊर्जा का संचार करते हैं। कई बार मैं सोचता भी हूँ कि ये बातें तो एक भाई को अपनी बहन से कहनी चाहिए। किंतु मैं अपनी दीदी के लिए क्या ही कर पाऊँगा?
वैसे दीदी की वे बातें सिर्फ़ कहने के लिए ही नहीं हैं। उन्होंने कई बार मुझे बदनज़र से, गलत बातों से और नकारात्मक भावों से बचाया है। मेरी दिव्यांगता के बारे में यदि कोई गलत बोलता है, सोचता है या फिर हीन दृष्टि रखता है, तो वह उससे भी भिड़ जाती हैं। लॉकडाउन में आजकल दीदी मेरे पास ही हैं। इस बार मैं फिर उनके हाथों से राखी बंधवाऊँगा। दीदी फिर एक बार तिलक लगाकर गाएँगी—'मेरे भइया, मेरे चंदा, मेरे अनमोल रतन; तेरे बदले मैं ज़माने की कोई चीज़ न लूँ'। मुझे नहीं पता मेरी ज़िंदगी के आगे का सफ़र न जाने कैसा होगा, किंतु मुझे यक़ीन है कि मेरी दीदी का प्यार, दुलार और आशीर्वाद हमेशा इन रेशमी धागों में बंधकर मेरी रक्षा करेगा और मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा। इस बार मैं भी दीदी को रक्षासूत्र बाँधूँगा और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करूँगा। ऐसी बहनें ही हमारी ऊर्जा का स्रोत हैं। उनको नमन है।
"दीदी, देना अपना प्यार,
तेरे लिए लाया उपहार।
मेरी रक्षा करते रहना,
यूँही हँसते-गाते रहना।"
—अनुभव राज
मुजफ्फरपुर, बिहार