गली के मोड़ पर
अब भी धुआँ उठ रहा है—
कल तक जहाँ एक दुकान थी,
आज वहाँ सिर्फ़ राख है
और लोहे की मुड़ी हुई साँसें।
हवा में बारूद नहीं,
डर की गंध है—
जो बच्चों के बस्तों तक
चिपक गई है।
एक आदमी
अपने ही घर की जली दीवार छूकर
हाथ पीछे खींच लेता है—
जैसे इतिहास अब भी
गर्म हो।
और कहीं दूर,
स्क्रीन पर चमकती बहसों में
आग तर्क बन रही है,
लपटें आँकड़े—
और सियासत
धीरे-धीरे
अपनी रोटियाँ सेंक रही है।
किसी ने नहीं देखा
पहली तीली किसने जलाई—
पर सबने देखा है
हर बार
आग ही को इलाज बताया गया।
इस बीच,
अमन अब शब्द नहीं—
एक पुरानी तस्वीर है,
जिस पर धूल जमती जा रही है।
देखो,
जल रहा है हिंदोस्तान—
इस बार
सिर्फ़ शहर नहीं,
हमारी याददाश्त भी।
- डॉ. प्रीति सुमन
सीतामढ़ी, बिहार