काले-काले, गज़ब निराले,
आसमान में बादल छाए।
रह-रह गरजे, उमड़े-घुमड़े,
बिजली रानी आँख दिखाए!
अब लगता है, तब लगता है,
बरसेंगे कजरारे बादल।
लेकिन झूठे-झूठे गरजे,
दुम दबाकर भागे बादल!
बिन बरसे सावन जाएगा,
नभ देख-देख कहते किसान।
ऐसे में कैसे होगा फिर,
और फसलें खेतों में धान?
ये बरसेंगे अब भादों में,
बूँदा-बाँदी कहीं-कहीं पर।
नभ के बादल अब बतलाओ,
फिर कहाँ बरसते जा-जाकर?
— डॉ. सतीश चन्द्र भगत
बनौली, दरभंगा, बिहार