तुम नहीं, हम नहीं, कमी सी है,
इन क़तारों में, कुछ नमी सी है।
यह तन्हाई कभी तो होगी तन्हा,
कुछ दुआएँ, बरहमी सी है।
मेरा हासिल सिफ़र, ग़ुरूर में है,
कुछ हवा है, कुछ थमी सी है।
मेरी दास्ताँ भी यही कहती है,
कुछ मगन होश, कुछ रमी सी है।
सफ़र आज ही पहुँचा है यहाँ,
कुछ आकासी, कुछ ज़मीं सी है।
मिले ज़ख़्म, शुक्रगुज़ार हैं हम,
कुछ तल्ख़ करा, कुछ घमी सी है।
तेरी यादों ने सब बहाल रखा है,
कुछ सुबह सी, कुछ तमी सी है।
मुझको ताउम्र तेरी हसरत है,
कुछ मियादी, कुछ ज़मीं सी है।
— ईं. राणा ब्रजेश
दरभंगा, बिहार