मरुभूमि बनने से पहले (छंदमुक्त) - रंजना लता

स्त्री-मन धरती जैसा होता है।
उसे मिलती रहे
सम्मान की धूप,
स्नेह का जल,
और विश्वास की हल्की बारिश—
तो वह चुपचाप
सोना उगाने लगती है।
उसकी गोद से
फूल भी जन्म लेते हैं,
और हर मौसम में ही...
वह घर-आँगन को
मुस्कानों से भर देती है।
पर यदि उसे
निष्ठुरता की धूप में छोड़ दिया जाए,
सम्मान का जल
उससे छीन लिया जाए,
और स्नेह की वर्षा भी थम जाए—
तो वही धरती
धीरे-धीरे
मरुभूमि हो जाती है।
फिर न फूल खिलते हैं,
न बगिया महकती है,
बस उड़ती रहती है
उदासी की रेत;
जिसमें वह मन भी
चुपचाप झुलसता है,
और उसकी किरचें
तुम्हारी आँखों को भी चुभती हैं।
इसलिए
यदि सच में पुरुष हो
तो पहले मनुष्य बनो—
और स्त्री-मन पढ़ो।
उसे मरुभूमि मत बनने दो।
बस थोड़ा सम्मान,
थोड़ा स्नेह देते रहो—
फिर देखना
धरती की तरह
वह देती ही जाएगी।
तुम हारकर भी जीत जाओगे,
और वह जीतकर भी अपना-
सब-कुछ हार जाएगी।


- रंजनालता
समस्तीपुर, बिहार 

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