चलो प्रणाम करते हैं (छंदमुक्त) - प्रसाद रत्नेश्वर

चले
अपने क़दमों से
गिरते-उठते
कराया जन से
लोक कला,
संस्कृति,
साहित्य का
साक्षात्कार।
बताया
सरोकार
अर्थ महोत्सव का,
सजाया
बिना प्रपंच का मंच,
चुकाया उधार।
बढ़े आगे
बढ़ते गए
ठहरना ही था
एक दिन
ठहर गए।
वे
छोड़ गए छाप
सांस्कृतिक जन-जीवन पर,
प्रमाण हैं
हवा में तैरते लोकगीत,
साथ देते बाजा-ढोलक,
हृदय में बसा
नाटक का कोई संवाद।
सटीक बैठता नहीं
हर कोई एक खांचे में,
उनके आवेदनों पर
अनुशंसाएं
देख लेना कभी
क़ैद संचिकाओं में।
वे देने गए थे
अपनी आँखें,
जिससे बहुत खूबसूरत
दिखती है यह दुनिया,
कौन लेता है यह!
चंपारण की धरा पर
जोह रहे बाट
हज़ारों प्रणम्य पदचिह्न।
बढ़ चले हैं
कुछ नए पाँव
उनकी ओर
ढूंढने अपना
विस्मृत...
चलो प्रणाम करते हैं।

- प्रसाद रत्नेश्वर 
मोतिहारी, बिहार 

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका