प्रेम में देना मुझे,
कनेर के फूल प्रिय!
सज कनुप्रिया के जूड़े
ज्यों इतराऊँ,
पीत-पट श्याम-सा
हर धूप, धूल, बारिश
और झेलते हुए उपेक्षा-दंश को...
जब भी बंशी की टेर सुनूँ,
कर श्रृंगार कनेर के फूलों से
दौड़ पड़ूँ सब छोड़-छाड़
हिय लगने को तेरे प्रिय!
हृदय की पीड़ा को
हरते हुए
शिवमय कर देती है साधक को,
बसा देती उसकी अंतरात्मा में
सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्...
फिर वह बढ़ता जाता है
अपने कर्म-पथ पर
निर्विकार भाव से,
जिसे न कोई जलन
देखकर बागों के गुलाब को,
फ़र्क न पड़ता
बन बालकनी की शोभा
इठलाती लेमन ग्रास देखकर,
या फिर बड़े ही तहज़ीब से
काट-छाँटकर सजाए गए
छुईमुई से उन्मन प्रिय!
सच तो यह है
कि उसे गेंदे-सा
मौसमी बनना पसंद नहीं,
न ही रंगून-क्रीपर सदृश
तिल-तिल रंग बदलना,
और न ही बेगोनिया के
कृत्रिम सुगंध-सा बनने की
कोई आकांक्षा प्रिय!
वह तो मेहनत की भट्ठी में तपा,
अनुभव की कसौटी को साधे,
अपने कर्म-पथ पर निरंतर
अग्रसर होता एक विलक्षण
प्राणप्रिय वनफूल है...
जो अकेले हर महँगी और
खूबसूरत प्रजाति से भिन्न है,
यही उसकी असल
पहचान है...
बिल्कुल हमारी तरह...
हाँ, बिल्कुल ही हमारी तरह!
- रजनी प्रभा
पटना, बिहार