जीवन एक कसौटी ( लघुकथा) - श्यामल बिहारी महतो

बाज़ार में ख़रीदारी कर, रोड किनारे हाथ में हेलमेट पकड़े बाइक के सामने अभी खड़ा ही हुआ था कि पचास-पचपन का एक अधेड़ हाथ जोड़े मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। आँखों पर मोटे फ़्रेम का चश्मा और कमीज़ की ऊपरी जेब में एक मामूली-सी क़लम, किसी ऑफ़िस का मामूली किरानी जान पड़ता था।
"कहिए, इस तरह हाथ जोड़ने का क्या मतलब...?" मैंने जानना चाहा।
"शायद आप यक़ीन नहीं करेंगे, मैं के.बी. कॉलेज का स्टाफ़ हूँ!"
"यह बात आप मुझे क्यों बता रहे हैं...?"
"मैं ऑटो-रिक्शा से फुसरो पहुँचा...!"
"तो...?"
"मेरा पर्स किसी ने मार लिया या ऑटो-रिक्शा पर चढ़ते वक़्त गिर गया...!"
"तो... मैं उसे ढूँढने जाऊँ? या इसके लिए मैं ज़िम्मेवार हूँ...?" मैं कुछ अनमना-सा हो उठा था।
"मुझे थोड़ी आपकी मदद चाहिए...!" उसने रोनी सूरत बना ली।
मैंने पहली बार उसे ऊपर से नीचे तक निहारा। साधारण वेश-भूषा! धूसर रंग का खुला हाफ़-स्वेटर पहने वह कहीं से मुझे छल-कपट और काइयाँ टाइप का नहीं लगा। सहसा मुझे बीस साल पहले के प्रेम दसौंधी की याद आ गई। तब मैं के.बी. कॉलेज का छात्र हुआ करता था और प्रेम दसौंधी कॉलेज के किरानी थे—मतलब ऑफ़िस स्टाफ़। वह हर दिन सुबह तेलो स्टेशन से ट्रेन पकड़ते और जारंगडीह स्टेशन पर उतरते, फिर तीन किलोमीटर पैदल चलकर कॉलेज पहुँचते थे। वह भी इसी तरह मोटे फ़्रेम का चश्मा पहनते थे और मामूली कंपनी की मामूली-सी क़लम अपनी शर्ट की ऊपरी जेब में हमेशा खोंसे रखते थे।
मैं अपने घर से हर दिन बीस किलोमीटर साइकिल चलाकर कॉलेज पहुँचता था। किसी-किसी दिन राह चलते दसौंधी दादा को भी अपनी साइकिल की पिछली सीट पर बिठा लेता था। बदले में कॉलेज लाइब्रेरी से हमें पढ़ने को ढेर सारे नोट्स मिल जाते थे। इस कारण दोनों के बीच दादा-भैया वाला रिश्ता बन आया था। इस आदमी ने ख़ुद को के.बी. कॉलेज का स्टाफ़ बताकर अकस्मात मुझे दसौंधी दादा की याद दिला दी थी, जिसे मैं भूल चुका था और जो अब इस दुनिया में जीवित नहीं थे...!
वह अब भी मेरे सामने हाथ जोड़े सुदामा-सी दीन-भाव की मुद्रा में खड़ा था और रोड पर लोगों की आवा-जाही जारी थी। ऐसे मौक़ों पर अक्सर मैं धोखा खाता रहा हूँ। भावुकता और भावनाओं का शिकार अब तक मैं कई बार हो चुका हूँ। लोग याचक बनकर पास आते हैं और रो-गाकर कर्ण की तरह मुझे लूटकर चले जाते रहे हैं। और ऐसे वक़्त माँ की कही बातें अक्सर मुझे कर्ण की तरह ही धर्म-संकट में डाल देती रही हैं—"जब भी घर में कोई भूखा-नंगा आ जाए, या कहीं मिल जाए, कुत्तों की माफ़िक उसे कभी दुत्कारना नहीं। जो हो सके, देकर ही भेजना, आदमी की दशा बदलते देर नहीं लगती...!" और माँ के इस संस्कार को अब तक निभाए जा रहा हूँ।
"तो... मुझसे आप क्या चाहते हैं...?" अंततः मैं ही पूछ बैठा।
"घर... कतरास, जाने भर का किराया... दे दीजिए... बड़ी मेहरबानी होगी आपकी...!"
"कितना... किराया है... कतरास का...?"
"चलीस... रुपये...!" अब भी उसके हाथ जुड़े हुए थे, जैसे ठान लिया हो, जो मिले लेकर ही हटना है सामने से!
देना ही था, देर करना मुनासिब नहीं लगा। पीछे की पॉकेट से पर्स निकाला और पैसे निकालने लगा। तालाब किनारे घात लगाए खड़े बगुले की तरह उसकी आँखें चमक उठीं। इतने में चालीस रुपये मैंने उसकी ओर बढ़ा दिए। उतनी ही फ़ुर्ती से उसने बीस-बीस के दो नोटों को पकड़ा और जुड़े हाथों से कहने लगा—"भगवान आपको सदा सलामत रखे, माँ-बाप का आशीर्वाद आपको मिलता रहे...!" फिर तेज़ी से वह बस पड़ाव की ओर बढ़ गया। दूर तक मेरी आँखें उसका पीछा करती रहीं। कुछ ही देर में वह भीड़ में ओझल हो गया और मेरी नज़रों से भी। हमेशा की तरह मेरे मन को सुकून मिला। पहले प्रेम दसौंधी को याद किया फिर माँ को याद करते हुए कहा—"माँ, आज फिर आपका बेटा एक मजबूर के काम आया...!"
थोड़ी देर बाद मैं भी चल पड़ा था। परन्तु मेरी आँखें अब भी उसको ढूँढती हुई जा रही थीं—जाने क्यों! तभी मैं चौंक उठा। पहले तो यक़ीन नहीं हुआ कि वह... वही आदमी है! रुककर फिर ग़ौर से देखा। हाँ, वही वेश-भूषा, वही मोटे फ़्रेम वाला चश्मा और वही धूसर रंग का खुला हाफ़-स्वेटर। अरे... बिलकुल वही था! अभी-अभी उसने एक फ़र्नीचर वाले दुकानदार से डाँट खाई थी—"कोई काम-धंधा नहीं मिलता? इस तरह मुँह उठाए चले आते हो, यह दुकान है कोई दान-आश्रम नहीं... चल जा...!"
इस झिड़की के बाद वह आगे बढ़ा, अबकी वह एक छुटभैया नेता के सामने उसी भाव-मुद्रा में खड़ा हो गया। उसका हाथ जोड़ने का अंदाज़ बड़ा निराला था।
"अरे आज अकेले! बेटी कहाँ है...?" उसने सीधे मुँह पूछ डाला।
"उसकी तबियत ठीक नहीं है... नेता जी...!"
"झूठ बोलोगे हमसे? अभी-अभी उसे रेलवे स्टेशन के बाहर लोगों के सामने दाँत निपोरते देखकर आ रहा हूँ...!"
वह और वहाँ नहीं रुका। तेज़ी से भागता हुआ ओवरब्रिज के पास पहुँचा और एक सपे़द रंग की स्कॉर्पियो के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया। मैं भी उसका पीछा करते हुए उससे थोड़ी दूरी पर आकर खड़ा हो गया था। महँगी गाड़ी की ठाठ-बाट देख मैंने अंदर झाँका। पहचान का निकला। शहर का एक बड़ा सिविल ठेकेदार नौरंगी लाल बैठा हुआ था। गाड़ी के अंदर से ही उसने उससे कहा—"मुफ़्त की खाने की आदत छोड़ो और किसी के यहाँ काम पर लग जाओ...!" बग़ल में बैठे साथी की ओर देखा—"इन साले-सरहजों को देखता हूँ तो मूड ख़राब हो जाता है... अरे बढ़ाओ... गाड़ी...!" खिझकर ड्राइवर से कहा उसने।
स्कॉर्पियो आगे बढ़ी तो मैं बाइक खड़ी कर उसके आगे आ गया। मुझे देखते ही वह नज़रें चुराने लगा। लेकिन अगले ही पल ढीठता का स्वेटर पहन निर्विकार भाव से वह खड़ा हो गया था—चालीस रुपये देने वाले की ऐसी की तैसी, कौन-चार हज़ार दे दिया है! उसकी भाव-भंगिमा यही बता रही थी। तब झिड़कते हुए मैंने कहा था—"तो यह है के.बी. कॉलेज के नक़ली स्टाफ़ का असली रूप! लोगों के विश्वास और भरोसे के साथ इस तरह खिलवाड़ करते हुए तुझे ज़रा भी शर्म नहीं आती है? आज तुझ जैसे लोगों के कारण ही लोगों का लोगों से विश्वास उठता जा रहा है। दीन-दुखियों को भीख नहीं मिल रही है। अरे... जिस सेठ से अभी तुमने डाँट खाई, उसी से कहते कि सेठ, दुकान में रख लो, सब काम कर दूंगा... लेकिन तुम तो काम करोगे नहीं... मुफ़्तख़ोरी और कामचोरी की बीमारी लग चुकी है तुम्हारी देह को...! थू है तेरी इस तरह रेंगने वाली ज़िंदगी पर...!" इसके साथ ही मैंने भी बाइक स्टार्ट की और आगे बढ़ गया! लुकिंग ग्लास में देखा, अवाक खड़ा वह मुझे दूर तक देखता रहा...!
सप्ताह भर बाद फिर मुझे एक ज़रूरी काम से फुसरो जाना पड़ा। फ़र्नीचर दुकान के सामने से गुजर रहा था कि तभी अचानक कानों में आवाज़ पड़ी—"प्रणाम सर!"
बाइक रोकी, गर्दन घुमाकर उधर देखा। वही के.बी. कॉलेज का नक़ली स्टाफ़ उसी फ़र्नीचर दुकानदार की दुकान में कपड़े से कुर्सी-अलमारियों की धूल-गर्दा झाड़ रहा था!
"यह हुई इज्ज़त की ज़िंदगी...!" बाइक से उतरकर मैंने कहा।
"बेटी को भी उस धंधे से हटा दिया है, सेठ जी ने उसे अग्रवाल नर्सिंग होम में रखवा दिया है, वह भी दवा-सूई करना सीख जाएगी। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर...!" उसने हाथ जोड़ लिए थे।
मेरा मन गद्गद् हो उठा था। एक बार फिर अपनी मरहूम माँ को मैंने याद किया और मुस्कुराकर आगे बढ़ गया।


— श्यामल बिहारी महतो
जन्म: 15 फरवरी 1969, ग्राम-मुंगो, जिला-बोकारो (झारखंड)।
शिक्षा: स्नातक।
संप्रति: सीनियर क्लर्क (स्पेशल ग्रेड), कार्मिक विभाग, तारमी कोलियरी (CCL)। इसके साथ ही मजदूर यूनियन में सक्रिय भूमिका।
साहित्यिक कृतियाँ:
कहानी संग्रह: बहेलियों के बीच (भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित), उबटन, लतखोर एवं बिजनेस।
उपन्यास: कोयला का फूल।
संपर्क: ग्राम-तुरीयो, पोस्ट-तुरीयो, पिन-829132, जिला-बोकारो (झारखंड)।

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