चंद पन्नों का अख़बार है ज़िंदगी (ग़ज़ल) - अशोक दर्द

चंद पन्नों का अख़बार है ज़िंदगी
कुछ बरसों की सरकार है ज़िंदगी

हम-से दुनियावी मुजरिमों के लिए
एक हसीं कारागार है ज़िंदगी

महकता हुआ एक गुलज़ार है
और चुभता हुआ ख़ार है ज़िंदगी

रिश्तों की तपन सीने में छुपाए
एक सुलगती हुई अंगार है ज़िंदगी

क़दमों में जो आए दरपेश अब
उन तजुर्बों का सार है ज़िंदगी

मिलता है यहाँ सब ख़रीदार को
एक सजा हुआ बाज़ार है ज़िंदगी

उठती लहर या पानी का बुलबुला
बस झूठा एक एतबार है ज़िंदगी

वीरानगी ख़िज़ाँ की सीने में लिए
महकती हुई एक बहार है ज़िंदगी

काँटों की चुभती सेज भी है यह
और फूलों का एक हार है ज़िंदगी

सागर से उठी, सागर में मिली
बादलों से निकली फुहार है ज़िंदगी

     - अशोक दर्द 

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