रात अप्सरा-सी लगती मैं, भोर भये तुमको ना भाती।
मैं हर रात सुहागन होती, रोज़ सुबह विधवा हो जाती।
कुछ पाने की आस सजाए, कुछ अतृप्त अभिलाषा लेकर।
मेरे द्वार चले आते हो, निज मन को कुछ प्यासा लेकर।
सब मनमानी करके जाते, मैं रहती मन में पछताती,
मैं हर रात सुहागन होती, रोज़ सुबह विधवा हो जाती।
दुःखी हुए तुम जब अपनों से, मुझमें तुमने नेह तलाशा।
तुम्हें करूँ संतुष्ट हर तरह, तुम रखते कुछ ऐसी आशा।
तुमको ख़ुश करने की ख़ातिर मैं, अपनी देह सजाकर लाती,
मैं हर रात सुहागन होती, रोज़ सुबह विधवा हो जाती।
इज़्ज़तदार घराने से हो, शोहरत में कुछ कमी नहीं है।
तुम रईस हो नाम बहुत है, किंतु कहो क्या सत्य यही है।
जग जाने तो मान घटेगा, सोच यही फटती है छाती,
मैं हर रात सुहागन होती, रोज़ सुबह विधवा हो जाती।
गणिका, नगरवधू, वेश्या सब, नाम तुम्हारे दिए हुए हैं।
काम रात के अंधियारे में, सही-ग़लत सब किए हुए हैं।
दर्द, गालियाँ, घृणा, उपेक्षा, सब सहती कुछ कह न पाती,
मैं हर रात सुहागन होती, रोज़ सुबह विधवा हो जाती।
काश कभी मेरे मन की भी, आह, वेदना तुम सुन पाते।
ज़ख़्म, दर्द, नफ़रत, गाली संग, नेह ज़रा-सा देकर जाते।
मैं भी हर पीड़ा को तजकर, गीत सुखद यादों के गाती,
मैं हर रात सुहागन होती, रोज़ सुबह विधवा हो जाती।
— डॉ. गोविंद 'गज़ब'
रायबरेली, उत्तर प्रदेश