बोलने का मन हो,
कुछ बातें
एकांत के लिए भी
बचाकर रखो।
सुनसान में
कह सकते हो,
गा सकते हो
गला खोलकर।
बुरा नहीं मानेगी
चिड़िया,
चुगली नहीं करेगी
हवा।
ग़ैर-ज़मानती
हो गए हैं
संबोधन,
कहना-सुनना।
ज़रूरी है सोचना,
देखना सोचकर,
यार,
बुरा मान जाते हैं लोग!
— प्रसाद रत्नेश्वर