दशकों पहले बहन,
भाई की कलाई पर
राखी बाँधा करती थी,
वह धागा केवल
शोभा नहीं होता था।
उसमें बहन का विश्वास,
भाई के लिए मंगलकामना
और रक्षा का संकल्प होता था।
वह अदृश्य कवच
भाई को शक्ति देता था,
और वही शक्ति
बहन के संकट में
ढाल बन जाती थी।
राखी की परंपरा
बहुत पुरानी कही जाती है,
राजाओं के समय भी
रक्षा-सूत्र बाँधने की परंपरा थी।
यह केवल रक्त का रिश्ता नहीं,
विश्वास और रक्षा का
पवित्र संकल्प था।
बहन जब भाई के मस्तक पर
तिलक लगाती थी,
उसमें विजय की कामना होती थी।
आरती की लौ में
ईश्वर से प्रार्थना होती—
भाई दीर्घायु हो,
हर संकट से बचा रहे,
यही उनकी इच्छा होती।
भाई जब बहन के हाथों से
मिठाई खाता था,
वह केवल मिठाई नहीं,
रिश्ते की मिठास होती थी।
राखी का वह धागा,
स्नेह और विश्वास की
मजबूत कड़ी थी,
दो दिलों के आँगन में
अपनेपन के फूल खिलाता था।
कभी राखी
केवल भाई की कलाई तक
सीमित नहीं थी।
किसी के हाथ पर
रक्षा-सूत्र बँधता,
तो वह भी
रक्षा का संकल्प लेता था।
फिर समय बदला,
रिश्तों के रंग बदले,
बचपन की सहजता छूटी,
और राखी भी
औपचारिक होती गई।
अब कलाई पर धागा है,
हाथ में उपहार है,
तस्वीरों में मुस्कान है,
पर कहीं-कहीं
वह पुराना विश्वास
कम दिखाई देता है।
बहन की अपेक्षा
उपहार तक सिमट जाती है,
पर जिस भाई की जेब खाली हो,
वह बहन के लिए
क्या खरीदे?
क्या प्रेम की कीमत
उपहारों से तय होगी?
क्या रिश्ते की मिठास
महँगी मिठाई की मोहताज़ है?
फिर भी,
जब बहन आज
भाई की कलाई पर
राखी बाँधती है,
उस एक पल के लिए
बचपन लौट आता है।
वह छोटा-सा धागा
आज भी कहता है—
रिश्ता अभी बाकी है,
स्नेह अभी बाकी है,
अपनापन अभी बाकी है।
ज़रूरत बस इतनी है—
राखी को धागा नहीं,
विश्वास समझें;
उपहार नहीं,
रिश्ते का संकल्प समझें।
वरना सच यही है—
कलाई पर राखी बँधती रहेगी,
पर यदि प्रेम और विश्वास
दिलों से उतर गए,
तो राखी
सिर्फ राखी बनकर रह जाएगी।
- तेज नारायण राय
ग्राम -कुल्हड़िया, पोस्ट- भैरवपुर, थाना -जामा जिला -दुमका, (झारखंड)
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