मुहब्बत-
जैसे अलसुबह मंदिर से आती हुई
घंटियों की झंकार,
आरतियों की मधुर-मधुर स्वर-लहरियाँ।
आईने के सामने खड़ी कोई नवयौवना,
अपनी ख़ूबसूरती को देख
इतराती-इठलाती तितलियों की मानिंद।
पहाड़ की चोटी से घाटियों की ओर
ख़रामा-ख़रामा उतरती
गुनगुनी, सुनहरी सर्दी की धूप।
हृदय की घाटियों से फूटता हुआ,
निर्मल, निश्छल, अनवरत
बहता हुआ जैसे लोकगीत का सोता।
मलयानिल में मद्धम-मद्धम, भीगी-भीगी,
भँवरों की गुंजन लिए
महकते हुए शोख़ फूलों की सुगंध।
आँखों की भाषा को पढ़ती-गुनती,
ध्वनियों से ही स्वतः
क्लिष्ट शब्दों के सारे अर्थ खोलती मेधा।
परिंदों की मानिंद जीवन के आँगन में
फुदकती-चहचहाती,
दुनिया की सरहदों की सारी हदें लाँघती।
बच्चों की तोतली ज़ुबान से झरती
इंद्रधनुषी रंगशाला,
दुनिया के तमाम प्रपंचों से बची हुई।
जीवन को जीवन की तरह गढ़ती,
पल-पल सँवारती,
दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत शय है— मुहब्बत।
— अशोक 'दर्द'
(ग्राम व डाकघर: शेरपुर, तहसील: डलहौज़ी, ज़िला: चंबा, हिमाचल प्रदेश - 176306)
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