क्यों गीत लिखूँ मैं (गीत) - सुमंगला सुमन


मुझको बता क्यों गीत लिखूँ मैं,
मनोभावों की हर रीत लिखूँ मैं!
नदियों ने तो सागर पाया,
किसके लिए नवगीत लिखूँ मैं?

शब्द-शब्द में दर्द पिरोकर,
कागज़ पर अहसास उतारूँ।
जो दिल में है, कह न सकूँ मैं,
गीतों में वो राज़ उभारूँ।
टूटे ख़्वाबों की किरचों से,
कैसे नई प्रीत लिखूँ मैं?

जब हर चेहरा भीड़ में खोया,
अपना कोई ख़ास नहीं है।
सन्नाटों की इस दुनिया में,
सच्चा कोई अहसास नहीं है।
फिर भी यह दिल हार न माने,
आशा की इक जीत लिखूँ मैं!

धूल भरी नफ़रत की राहें,
स्नेह का दीप जलाती हूँ।
गिरकर फिर जो उठ जाते हैं,
उनका हौसला बढ़ाती हूँ !
अंधेरों से लड़ते-लड़ते,
रोशनी भरी प्रीत लिखूँ मैं!

मुझको बता क्यों गीत लिखूँ मैं,
मनोभावों की हर रीत लिखूँ मैं!


— सुमंगला सुमन
   मुम्बई, महाराष्ट्र

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