प्यासी धरा मिथिला की, शुष्क हुई अबला-सी,
सूख गए नदी-नाले, चिंता हुई जान की।
लोग-बाग, ऋषि-मुनि छोड़ आए होम-धुनि,
पहुँचे जनक द्वार, रक्षा करें जान की!
है राजन से आग्रह, कहता नक्षत्र-ग्रह,
हल जो चलाएँ आप, होगी रक्षा जान की।
जनक ने थामा हल, मिला अनुपम फल,
प्यासी धरा तृप्त हुई, गोद आई जानकी!
बादल गरज उठे, जलद बरस उठे,
देव फूल बरसाएँ देख-देख जानकी।
ढोल और मृदंग बजे, तन में उमंग सजे,
प्रकृति महक उठी देख-देख जानकी!
चौहुँदिश छाई खुशी, हर मुख बसी हँसी,
सब कहें— चले चलो, आएँ देख जानकी।
मुदित सुनैना हुईं, नीर-युक्त नैना हुईं,
जनक विभोर हुए देख-देख जानकी!
मिथिला पधारे राम, करने गुरु का काम,
सुन-सुन इच्छा हुई— देखें कैसी जानकी!
नगर के नर-नारी, दास-दासी, परिचारी,
कोई कहे ऐसी है, तो कोई वैसी जानकी।
नूतन नवल बेला, प्रातःकाल अलबेला,
बाग बीच आए राम, सोचें कैसी जानकी!
दिखीं गौरी द्वार सीता, कहे राम— मन-मीता,
सबसे अलग, नहीं किसी जैसी जानकी!
— आचार्य धीरेन्द्र झा 'माणिक्य'
सीतामढ़ी, बिहार