भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे कई नायक हुए जिन्होंने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष नहीं किया, बल्कि राष्ट्र की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को भी एक नया आयाम दिया। ऐसे ही व्यक्तित्वों में अग्रणी नाम है—राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन। 1 अगस्त 1882 को प्रयागराज (इलाहाबाद) की ज्ञान-धरा पर जन्मे टंडन जी एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रखर स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि हिंदी भाषा और साहित्य के अनन्य संवाहक थे।
राजर्षि टंडन का दृढ़ विश्वास था कि कोई भी राष्ट्र अपनी निज भाषा के बिना पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हो सकता। उन्होंने माना कि भारत जैसे विविध संस्कृति वाले देश को एकता के सूत्र में पिरोने का काम केवल हिंदी ही कर सकती है।
वर्ष 1910 में स्थापित 'हिंदी साहित्य सम्मेलन' के निर्माण और विकास में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने इस मंच को केवल साहित्यिक गोष्ठियों तक सीमित न रखकर राष्ट्रभाषा प्रचार के एक व्यापक आंदोलन में बदल दिया।
उनके प्रयासों से हिंदी साहित्य सम्मेलन ने देश के कोने-कोने—विशेषकर अहिंदी भाषी क्षेत्रों—में हिंदी शिक्षा और परीक्षाओं का प्रसार किया।
जब देश का संविधान तैयार हो रहा था, तब हिंदी को राष्ट्रभाषा/राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए संविधान सभा में गहन बहस चल रही थी। राजर्षि टंडन ने इस बहस में हिंदी के पक्ष को अत्यंत तर्कसंगत, ओजस्वी और निर्भीक ढंग से रखा।
"भाषा किसी देश की आत्मा होती है। हिंदी केवल एक बोली या भाषा नहीं, बल्कि भारत की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है।"
उनकी तर्कशक्ति, दृढ संकल्प और अविरल संघर्ष का ही परिणाम था कि 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उनकी त्याग-भावना, ऋषितुल्य जीवनशैली और निःस्वार्थ सेवा को देखते हुए उन्हें 'राजर्षि' (राजा + ऋषि) की उपाधि से अलंकृत किया था।
उन्होंने कई उदीयमान कवियों, लेखकों और विचारकों को संबल प्रदान किया। उनके लिए साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जन-जागृति और चरित्र-निर्माण का माध्यम था। उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति, शिक्षा नीति और मातृभाषा के महत्व पर गंभीर विचार प्रस्तुत किए।
हिंदी भाषा, समाज सेवा और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके अतुलनीय योगदान को रेखांकित करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1961 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। 1 जुलाई 1962 को यह महान तपस्वी भौतिक संसार से विदा हो गया, लेकिन हिंदी साहित्य और भाषा-चिंतन के रूप में उनकी विरासत अमर है।
आज जब हम वैश्विकता के दौर में अपनी भाषाई जड़ों को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं, तब राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का जीवन और दर्शन हमारे लिए मार्गदर्शक दीप-स्तंभ की तरह है। हिंदी भाषा के प्रति उनका निष्काम समर्पण ‘बोधायन’ के पाठकों और संपूर्ण हिंदी समाज को अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करने की प्रेरणा देता रहता है।
- बोधायन पत्रिका
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