कमाल कैण्डी का (लघुकथा) - डॉ. कुमारी सोनी (सोनिया अनंत)


कड़ाके की ठंड थी। हर तरफ़ सर्द हवाएँ बह रही थीं। मैं अपने दफ़्तर से घर लौटने के लिए बस स्टैंड पहुँचा। बस के आने में अभी वक्त था। मैं खड़ा इंतज़ार ही कर रहा था कि मेरी नज़र एक बूढ़े व्यक्ति पर पड़ी। मैले-कुचैले कपड़ों में किनारे बैठा वह कुछ चीज़ें बेच रहा था। उसके हाथ ठंड से काँप रहे थे। मैं उसके नजदीक गया तो झुर्रियों से भरी उसकी उदास आँखें मुझे ऐसे घूरने लगीं मानो कुछ कहना चाह रही हों। मुझे उस पर दया आ गई और मैं अपने वॉलेट से कुछ रुपये निकालकर उसे देने लगा।
पर उस बूढ़े व्यक्ति ने पैसे लेने से साफ़ इंकार कर दिया और कहने लगा— "साहब! आप अपने बच्चों के लिए आँवले की कुछ कैण्डी ले लो। मेरी मेहरारू बहुत जतन से बनाती है इसे। सर्द मौसम में यह स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छी होती है।" मैंने बिना समय गवाँए उसे सौ रुपये दिए और कैण्डी ले ली।
अब यह प्रतिदिन की बात हो गई। हर रोज़ मैं घर लौटते वक्त उससे कुछ कैण्डी खरीद लिया करता था। कभी-कभी कुछ कैण्डी अपने दोस्तों को भी खिलाता था। कैण्डी का स्वाद लगते ही कुछ दोस्त भी मेरी ही तरह उससे कैण्डी खरीदने लगे। यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा। मैंने देखा कि मेरे बच्चे जो ठंड में ज़ुकाम से परेशान रहते थे, अब ठीक होने लगे थे। मेरे गले की ख़राश भी काफ़ी कम हो गई थी। मैं तो उस बूढ़े व्यक्ति की मदद करने के उद्देश्य से कैण्डी खरीदता था, पर मुझे बिलकुल अनुमान नहीं था कि प्रतिदिन आँवले की कैण्डी के सेवन से स्वास्थ्य पर इतना अच्छा असर पड़ेगा!
एक दिन जब घर लौटते हुए मैं उससे कैण्डी खरीदने गया, तो उसे देखकर मेरी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं। वह नए कपड़ों में, हाथ में एक डिब्बा लिए चमकती आँखों से मुझे ही देख रहा था। उसने कहा— "साहब! आज मेरी मुनिया का ब्याह है। आपके सहयोग से मैं उसके लिए कुछ पैसे जोड़ पाया। आप जुग-जुग जियो साहब! आपके बच्चे खूब पढ़ें, आगे बढ़ें।"
यह कहते हुए उसने मिठाई का डिब्बा मेरे हाथों में थमा दिया। हाथों में डिब्बा लिए मैं उसे देखता ही रह गया। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास का जो भाव था और आँखों में आत्मनिर्भरता की जो चमक थी, उसे बयाँ करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। पर मेरी आँखें, जो आँसुओं से भीग चुकी थीं, बहुत कुछ कह रही थीं!


— डॉ. कुमारी सोनी (सोनिया अनंत)
           नालंदा, बिहार 

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