हिंदी साहित्य का आदिकाल केवल राजाओं के युद्धों और दरबारी काव्यों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह देश में एक महान सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना के जागरण का काल भी था। इस चेतना के केंद्र में थे—महायोगी गोरखनाथ (11वीं से 13वीं सदी के मध्य)। गोरखनाथ जी हिंदी के 'नाथ साहित्य' के आरंभकर्ता और हठयोग परंपरा के अद्वितीय प्रतिष्ठापक माने जाते हैं। उन्होंने रूढ़ियों, बाह्याडंबरों और पाखंडों पर करारी चोट की, जिसकी गूंज आगे चलकर कबीरदास और पूरे भक्ति काल के संतों की वाणी में सुनाई दी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही कहा था कि—"कबीर की अपेक्षा उनकी भाषा अधिक निश्चित और व्यवस्थित खड़ी बोली है।"
आइए, आज 'बोधायन पत्रिका' के माध्यम से हम इस महान कालजयी संत की वाणी, दर्शन और भाषाई शिल्प को गहराई से समझते हैं।
मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) के इस महान शिष्य ने संसार को यह सिखाया कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर ही विद्यमान है। उनकी 'सबदी' (शबदी) और 'प्राण संकली' जैसी रचनाओं में मन को नियंत्रित करने और शून्य समाधि में लीन होने का अनूठा दर्शन मिलता है।
पंक्तियाँ:
हबकि न बोलिबा, ठबकि न चलिबा, धीरे धरिबा पांव।
गरब न करिबा, सहजे रहिबा, भणत गोरष राऊ॥
भावार्थ: महायोगी गोरखनाथ कहते हैं कि साधक को कभी भी उतावलेपन या क्रोध में आकर अहंकार से भरे वचन नहीं बोलने चाहिए, न ही अभिमान में पैर पटक कर चलना चाहिए। हमेशा अत्यंत धैर्यपूर्वक और सचेत होकर कदम बढ़ाना चाहिए। अहंकार का त्याग करके अत्यंत सहज भाव से जीवन जीना चाहिए।
गोरखनाथ जी ने समाज में फैले अंधविश्वासों, खोखले धार्मिक कर्मकांडों और केवल ऊपरी वेशभूषा धारण करने वाले तथाकथित ज्ञानियों को आड़े हाथों लिया। कबीर से सदियों पहले उन्होंने जो निर्भीक स्वर उठाया, वह अद्भुत था।
पंक्तियाँ:
अंजन माहीं निरंजन कढ़िया, तिल मुखि तेल बिया।
घृत माहीं जिनि मथण कढ़िया, ताकूं गुरु कहि लिया॥
भावार्थ: योगी कहते हैं कि जैसे तिल के भीतर ही तेल छिपा होता है और दूध को मथने से ही घी प्रकट होता है, ठीक उसी तरह इस हाड़-मांस के संसारी शरीर (अंजन) के भीतर ही वह परम तत्व ईश्वर (निरंजन) छिपा हुआ है। जिसने अपनी साधना से इस रहस्य को जान लिया, वही सच्चा गुरु है।
गोरखनाथ की भाषा में देश की विभिन्न बोलियों का सम्मिश्रण था, जिसे 'सधुक्कड़ी' कहा गया। लेकिन उनकी रचनाओं में खड़ी बोली और राजस्थानी का जो पुट मिलता है, उसने हिंदी कविता को जन-जन तक पहुँचाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। उनकी तुकबंदी सहज, मारक और सीधे दिल पर असर करने वाली थी।
महायोगी गोरखनाथ का साहित्य और दर्शन हमें सिखाता है कि आत्म-संयम, सदाचार और मानसिक पवित्रता ही सबसे बड़ी साधना है। मिश्रबंधुओं ने तो उन्हें "हिंदी का प्रथम गद्य लेखक" तक स्वीकार किया है। आदिकाल के इस महाशिल्पी ने जिस 'नाथ पंथ' की नींव रखी, उसने भारतीय अध्यात्म और साहित्य दोनों को युगों-युगों के लिए अमर कर दिया। आज की भटकती हुई युवा पीढ़ी के लिए उनका इंद्रिय-निग्रह और सहज जीवन का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है।
साभार और संदर्भ सूची :
स्रोत ग्रंथ: गोरख-बानी (संपादक: डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल)।
ऐतिहासिक संदर्भ: आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (नाथ साहित्य अनुभाग) एवं डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी कृत 'नाथ संप्रदाय'।
विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के मंच से भारतीय मनीषा, हठयोग के प्रवर्तक और कालजयी संत महायोगी गोरखनाथ के प्रति सादर साभार समर्पित है।