स्वयं को ही मैं दुर्बल कर रहा हूँ(ग़ज़ल)—सत्यम् दुबे 'शार्दूल'


स्वयं को ही मैं दुर्बल कर रहा हूँ,
ये कैसे प्रश्न को हल कर रहा हूँ।

मैं इंसाँ हूँ, कोई सूरज नहीं मैं,
अचानक किसलिए फिर ढल रहा हूँ।

मुझे छूना न, मुझसे दूर रहना,
ज़माने से ही अंदर जल रहा हूँ।

रहूँ कैसे भला पाबंदियों में,
हमेशा मैं बहुत चंचल रहा हूँ।

नहीं कुछ दे सका मैं भाइयों को,
वे क्यों कहते हैं मैं संबल रहा हूँ।

- सत्यम् दुबे 'शार्दूल' 
सम्प्रति - विद्यालय अध्यापक (11-12) उ० मा० विद्यालय मसौढ़ी पटना बिहार।
'रचना उत्सव' समेत देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का समय-समय पर प्रकाशन।
तीन साझा संकलन -
१. एंजिल्स साझा काव्य संग्रह 
२.२०२४ की दिलकश ग़ज़लें
३. माटी बेचवा साझा काव्य संग्रह 

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