साँझ ढली अब छोड़ समुंदर, लौट मछेरे।
सूरज भी अब लौट रहा घर, लौट मछेरे।
सोन मछरिया मोहक माया तृषित रहेगा,
तोड़ अभी सारा भ्रम-मंज़र, लौट मछेरे।
साहिल से मिल लौट रही हर लहर मछेरे,
शाम बढ़े तम मंथर-मंथर, लौट मछेरे।
चारु मछेरन बाट अगोरे बेबस होकर,
प्रीत पुकारे मीत निरंतर, लौट मछेरे।
चाँद लिखेगा गीत मिलन का रात ढलेगी,
माँग भरेगी आज मुक़द्दर, लौट मछेरे।
महक उठेगी रात सुनहरी मधुर मिलन में,
खोकर निज अस्तित्व परस्पर, लौट मछेरे।
'कुमुद' कहे मत समय गँवा किस मोह रमा तू,
बाँह पसारे मीत अनश्वर, लौट मछेरे।
—अशोक श्रीवास्तव 'कुमुद'
निवास: प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
पद: सह-संपादक (साहित्यिक पत्रिका "गुफ्तगू", प्रयागराज) एवं कुशल पर्यावरण विशेषज्ञ।
कृतियाँ: अंतर्नाद, सुरबाला, सोंधी महक, चंचल चुनमुन, तरंगिणी (छंदबद्ध एकल काव्य संग्रह) सहित एक दर्जन से अधिक साझा संग्रह।
सम्मान: बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन (पटना), मातेश्वरी विद्यादेवी बाल साहित्य शोध एवं विकास संस्थान (सिरसा), मगध साहित्य प्रेरणा उत्सव (राजगीर) सहित देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित सम्मान।