मापे नहीं जा सकेंगे दुख​— साधना कृष्ण



​पाबंदी की दीवारों के भीतर

कुनमुनाती, ठुनकती, तड़पती

पीड़ा के अहसास को

नहीं समझ सकोगे तुम।

​रोशनी को रोकतीं वे जालियाँ...

बाहर मरते परिंदों की

विकल चाहत को

नहीं महसूस कर सकोगे तुम।

​अरमान से बड़े ख्वाबों को सजाने के बाद

एक-एक होकर गिरतीं, धराशायी होतीं

ख्वाहिशों की अथाह पीड़ा को

कभी नहीं समझ सकोगे तुम।

​ससुराल से ऊबकर आई बिटिया को

बाबुल द्वारा दिए उपालंभ से

ज़र्रा-ज़र्रा बिखरती बेटियों की अनकही

कुंठा और छटपटाती उदासी को

नहीं माप सकोगे तुम।

​पढ़-लिखकर साहब बनने का स्वप्न सजाए

बेरोज़गार, अभिशप्त युवा के

अंतस-गह्वर से उठते हाहाकार को

भला कैसे सुनोगे तुम?

छिन्न-भिन्न होती युवाओं की ज़िंदगी को

नहीं बचा सकोगे तुम।


—साधना कृष्ण

हाजीपुर, बिहार

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