पाबंदी की दीवारों के भीतर
कुनमुनाती, ठुनकती, तड़पती
पीड़ा के अहसास को
नहीं समझ सकोगे तुम।
रोशनी को रोकतीं वे जालियाँ...
बाहर मरते परिंदों की
विकल चाहत को
नहीं महसूस कर सकोगे तुम।
अरमान से बड़े ख्वाबों को सजाने के बाद
एक-एक होकर गिरतीं, धराशायी होतीं
ख्वाहिशों की अथाह पीड़ा को
कभी नहीं समझ सकोगे तुम।
ससुराल से ऊबकर आई बिटिया को
बाबुल द्वारा दिए उपालंभ से
ज़र्रा-ज़र्रा बिखरती बेटियों की अनकही
कुंठा और छटपटाती उदासी को
नहीं माप सकोगे तुम।
पढ़-लिखकर साहब बनने का स्वप्न सजाए
बेरोज़गार, अभिशप्त युवा के
अंतस-गह्वर से उठते हाहाकार को
भला कैसे सुनोगे तुम?
छिन्न-भिन्न होती युवाओं की ज़िंदगी को
नहीं बचा सकोगे तुम।
—साधना कृष्ण
हाजीपुर, बिहार