हमारे सामने जब माहताब होता है (ग़ज़ल)- आर पी 'घायल'


हमारे     सामने    जब    माहताब    होता  है
किसी   के   हाथ  का  पत्थर  गुलाब होता है

झुका  करती   है  ये  दुनिया  उसी  के सामने
हरेक    दौर    में    जो    कामयाब   होता  है

पसीना  देता  है   हर  दिन  उसी  को ताज़गी
हमेशा  सर   पे   जिसके  आफ़ताब  होता है

जहाँ  क़िताब  की   बिक्री   कहीं   नहीं होती 
हरेक   शख़्स   का   चेहरा   किताब  होता है

जहाँ  पिघला  नहीं  पत्थर किसी की आह से
वहाँ   की   ख़ामुशी  में   इंक़िलाब   होता  है

मुहब्बत  की भनक लगते सुलगता है ज़माना 
जिधर  देखो  धुआँ  क्यों   बेहिसाब  होता  है

बरसता  नूर  है  'घायल'  अंधेरी  रात  में  भी
किसी  का  हुस्न  जब भी  बे-नक़ाब  होता है

.... परिचय ....

1. नाम ----आर पी 'घायल' 
2. निवास - स्थान ---भूतनाथ रोड, पटना, बिहार 
3.सेवा क्षेत्र ----भारतीय रिज़र्व बैंक, पटना और मुंबई 
4. प्रकाशित पुस्तकें ----1 लपटों के दरमियाँ  2.         अज़ीमाबाद की ख़ुशबू 
5. सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक, भारतीय रिज़र्व बैंक, पटना.


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