हर रात
आवाज़ देकर
बुलाती हैं
घर की दीवारें,
खिड़कियाँ-दरवाज़े।
झूमर सा
उजियारा-प्यारा
मेरा घर, मेरा संसार।
रिश्तों की डोर
आवाज़ देती है वहाँ;
माँ की ममता,
पिता का स्नेह,
उनका साया,
उनका सरमाया,
देते हैं खुशियाँ
बेशुमार।
वहीं
पिता के खाँसने की आवाज़
देती है गवाही
उनकी उपस्थिति की,
और मैं जागता रहता हूँ,
महसूसता हूँ
उन्हें और उनका दर्द।
रात के सन्नाटे में
तैरती हैं
मेरे कानों से
हृदय तक,
आशीर्वाद की पुरवाइयाँ।
मेरे पिता की
मौजूदगी का एहसास
भर देता है उजास,
मन में खुशी
और आत्मविश्वास।
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डॉ. रशीद ग़ौरी, सोजत सिटी (राजस्थान)
— वरिष्ठ कवि, लेखक व साहित्यकार। एकल कहानी संग्रह 'नीला आकाश' प्रकाशित। 'कश्मकश: ज़िंदगी की' (लघुकथा संग्रह) तथा 'सुनो, सूत्रधार सुनो' (कविता संग्रह) प्रकाशन प्रक्रियाधीन। राज्य सेवा से सेवानिवृत्त।