कवि कल्लोल — आदिकालीन लोक-संस्कृति, लौकिक प्रेम और 'ढोला-मारू' के अमर चितेरे


हिंदी साहित्य का आदिकाल जहाँ एक तरफ राजाओं के युद्धों और दूसरी तरफ नाथ-सिद्धों की कठिन साधना से प्रभावित था, वहीं उस दौर में आम जनता के दिलों में धड़कने वाले सहज प्रेम और लोक-जीवन को अमर करने वाले एक अनूठे कवि हुए—कवि कल्लोल (11वीं से 14वीं सदी के मध्य)। कवि कल्लोल को आदिकालीन लौकिक साहित्य का स्तंभ माना जाता है। उनकी अमर कृति 'ढोला मारू रा दूहा' राजस्थानी और हिंदी लोक-साहित्य की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने रूखे उपदेशों से दूर हटकर इंसानी दिल के सबसे कोमल एहसास—'प्रेम और विरह' को जनभाषा में पिरोया, जिसकी मिठास आज भी हमारे लोक-गीतों में जीवित है।

आइए, आज 'बोधायन पत्रिका' के माध्यम से हम लोक-चेतना के इस अनूठे महाशिल्पी के काव्य-वैभव और उनकी कालजयी प्रासंगिकता को गहराई से समझते हैं।

कवि कल्लोल ने राजकुमार ढोला और राजकुमारी मारवणी की प्राचीन लोक-कथा को 'दूहा' (दोहा) छंद में इस तरह पिरोया कि वह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि भारतीय नारी के विरह और प्रेम की जीवंत अभिव्यक्ति बन गई। उनके काव्य में प्रकृति और मानवीय भावनाओं का बेजोड़ तालमेल है।

पंक्तियाँ (मारवणी का विरह संदेश):
ढोला संदेसउ लग्‍गियउ, कंत न फिरीयउ आंणि।
पंथी एक संदेसड़ौ, लगि पिउ कज विखांणि॥

भावार्थ: विरह में व्याकुल राजकुमारी मारवणी रास्ते से गुजरने वाले राहगीर (पंथी) से कहती है कि हे राहगीर! मेरा एक संदेश मेरे प्रिय (ढोला) तक पहुँचा देना। उनसे कहना कि तुम्हारी राह देखते-देखते मेरी आँखें थक गई हैं, अब तो लौट आओ, तुम्हारे बिना यह जीवन बिखर रहा है।

कवि कल्लोल ने हिंदी साहित्य में 'बारहमासा' (वर्ष के बारह महीनों में विरह का वर्णन) की एक सुदृढ़ पृष्ठभूमि तैयार की। वर्षा ऋतु में बिजली का चमकना, बादलों का गरजना और विरहिणी के दिल की तड़प का जैसा स्वाभाविक चित्रण उनके यहाँ मिलता है, उसने आगे चलकर सूफी कवियों (जैसे जायसी) का मार्ग प्रशस्त किया।

पंक्तियाँ:
पावस आइउ मेह धुअ, धरणि सुहव्‍विय लील।
पिउ बिन विरह डराविइ, थल जल भया अतील॥

भावार्थ: वर्षा ऋतु आ गई है, मेघ गरज रहे हैं और धरती हरी-भरी चादर ओढ़कर सुहावनी हो गई है। लेकिन अपने प्रिय के बिना यह सुंदर मौसम भी विरहिणी को डरा रहा है। जल और थल सब एक हो गए हैं, पर हृदय का सूनापन दूर नहीं हो रहा।

कवि कल्लोल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने किसी राजा को रिझाने के लिए नहीं, बल्कि आम जनता के कण्ठ का हार बनने के लिए काव्य रचा। उनकी भाषा में जो सादगी, तरलता और गेयता (गाने का गुण) है, वह सदियों बाद भी राजस्थान, मालवा और ब्रज के लोक-मानस में रस घोल रही है।

कवि कल्लोल का साहित्य हमें सिखाता है कि युद्धों और मजहबी बहसों के बीच भी जो तत्व मनुष्य को हमेशा जीवित और संवेदनशील बनाए रखता है, वह है—'प्रेम'। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'ढोला मारू रा दूहा' के सौंदर्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। आदिकाल के इस महाशिल्पी ने जिस लोक-साहित्य की नींव रखी, उसी ने आगे चलकर रीतिकाल और आधुनिक काल के स्वच्छंदतावादी काव्य को समृद्ध किया। आज की यांत्रिक और भागदौड़ भरी जिंदगी में लोक-भाषा की यह सोंधी खुशबू और सहज प्रेम का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है।

साभार और संदर्भ सूची :
स्रोत ग्रंथ: ढोला मारू रा दूहा (मूल पाठ, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी)।
ऐतिहासिक संदर्भ: डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी कृत 'हिंदी साहित्य का आदिकाल' एवं आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (लौकिक साहित्य अनुभाग)।

विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के मंच से भारतीय लोक-संस्कृति, सहज मानवीय प्रेम के अमर प्रणेता कवि कल्लोल के प्रति सादर साभार समर्पित है।

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