कल नहीं
जब मैं रहूँगा
याद आऊँगा।
मौन हो
गुमसुम रहा
समझा गया चुप्पा,
सबकी नज़रों में
अहं में
फूलकर कुप्पा!
पीर अंतस्
में दबाए
गुनगुनाऊँगा।
रहा माली
मैं चमन का
श्रमिक उपवन का,
कली-पुष्पों
का पहरुआ
महक मधुवन का;
पौध-पत्ती,
टहनियों में
मुस्कुराऊँगा।
साख शब्दों
की घटी
शोहरत कमाने में,
सभी अंधी
दौड़ में
शिखरत्व पाने में;
शांत रह
कृतियाँ सिरजकर
छोड़ जाऊँगा।
जिऊँ जब तक
भाव सबसे
दोस्ताना हो,
आख़िरी दम तक
अदब ही
आशियाना हो;
पपड़ियाए
लबों पर
मुस्कान लाऊँगा।
कल नहीं
जब मैं रहूँगा
याद आऊँगा।
-भगवती प्रसाद द्विवेदी
सर्जना, सृजनशील कॉलोनी, बिस्कुट फैक्ट्री रोड, मगध आईटीआई के निकट, नासरीगंज, दानापुर, पटना - 801503 (बिहार)
हिन्दी और भोजपुरी के लब्धप्रतिष्ठित कथाकार, कवि, समालोचक और लोक साहित्य के अध्येता। बाल साहित्य के समर्पित रचनाकार। हिन्दी और भोजपुरी की २१-२१ और बाल साहित्य की शताधिक कृतियाँ प्रकाशित, विभिन्न राज्यों की पाठ्यपुस्तकों में संकलित और अंग्रेजी व भारतीय भाषाओं में अनूदित।