तेरे मख़मली लफ़्ज़ों का दीवान रखा हूँ,
शायद भूल गई, पर निशान रखा हूँ।
वे फूल जो मिले थे ख़ुतूत के साथ,
आज भी उसकी पहचान रखा हूँ।
खड़ा है दरख़्त आज उसी पार्क में,
जिसका नाम मिहर जान रखा हूँ।
जाने क्यों छोड़ गई वो अपना शहर,
मैं अभी तक वहाँ, मकान रखा हूँ।
बाद मुद्दत के "बैत" मिली उसी जगह,
जहाँ आज भी दिल जवान रखा हूँ।
—बैतुल्लाह बैत छपरवी
छपरा, बिहार