​तेरे मख़मली लफ़्ज़ों का दीवान रखा हूँ(ग़ज़ल) — बैतुल्लाह बैत छपरवी


​तेरे मख़मली लफ़्ज़ों का दीवान रखा हूँ,

शायद भूल गई, पर निशान रखा हूँ।


​वे फूल जो मिले थे ख़ुतूत के साथ,

आज भी उसकी पहचान रखा हूँ।


​खड़ा है दरख़्त आज उसी पार्क में,

जिसका नाम मिहर जान रखा हूँ।


​जाने क्यों छोड़ गई वो अपना शहर,

मैं अभी तक वहाँ, मकान रखा हूँ।


​बाद मुद्दत के "बैत" मिली उसी जगह,

जहाँ आज भी दिल जवान रखा हूँ।


—बैतुल्लाह बैत छपरवी
       छपरा, बिहार

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