सुनकऽ बातो हिआं न अइले तूं।
आइकल दिल कहाँ लगइले तूं।
एक सूरत बनल रहे मन में,
कोन चेहरा अपन बनइले तूं।
जीत के आपिसो हिआं अइली
खेल के दान अब हरइले तूं।
घाव टटके रहे छुटल हम्मर,
फेर के मुंह, घबइल कइले तूं।
जानेजां तूं कभी रहे कहले
ज़ख्म देके अभी चिन्हइले तूं।
एक तोरे भरोस पर रहली
दोसरा खोज के डरइले तूं।
थामली हाथ जब जरूरत में,
अब कहां बेर पर बोलइले तूं।
ई. राणा ब्रजेश
दरभंगा, बिहार