ब्याज का टापू(लघुकथा)— विभा रानी श्रीवास्तव


—विभा रानी श्रीवास्तव
दिन की चुभती हुई धूप की जगह अब एक ठंडी, मखमली हवा ने ले ली थी। पेड़ों पर चहचहाहट तेज़ हो गई थी। हरीश बाबू ने अपनी किराने की दुकान का शटर आधा गिराया और गल्ले (कैश बॉक्स) के पास बैठ गए। गल्ले से नोटों की गड्डी निकाली। कुल मिलाकर पंद्रह हज़ार चार सौ रुपये। हरीश बाबू के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई। उनके लिए यही उनकी 'दिन की पूँजी' थी, जिससे उनका घर चलता था और बैंक बैलेंस बढ़ता था। वे दुकान पूरी तरह बंद करने ही वाले थे कि तभी एक कमज़ोर सी आवाज़ आई, "बाबूजी... कुछ खाने को दे दो। बड़ी भूख लगी है।"
हरीश बाबू ने पलटकर देखा। सामने एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। फटे-पुराने कपड़े, चेहरे पर झुर्रियों का जाल और आँखों में बेबसी। हरीश बाबू का हाथ अनजाने में ही जेब के नोटों की तरफ़ गया, लेकिन फिर कुछ सोचकर उन्होंने नोट हाथ में ही दबाए रखा।
उन्होंने दुकान के अंदर देखा। एक शेल्फ़ पर ताज़े ब्रेड का पैकेट, जैम की शीशी और दही की थैली रखी थी। हरीश बाबू ने शटर थोड़ा ऊपर उठाया, अंदर गए और ब्रेड, जैम और दही ले आए। उस सामान को उस बूढ़ी औरत के हाथों में थमा दिया।
बूढ़ी औरत ने काँपते हाथों से सामान थाम लिया। उसकी सूखी आँखों में अचानक चमक आ गई। "जुग-जुग जियो बाबू! भगवान तुम्हारी तिजोरी हमेशा भरी रखे।" उसने आसमान की तरफ़ हाथ उठाया और भरभराई आवाज़ में कहा।
की आँखों से छलकते आँसू और चेहरे के उस सुकून को देखकर हरीश बाबू के चेहरे पर संतोष का गाढ़ापन छा गया। बूढ़ी औरत दुआएँ देती हुई आगे बढ़ गई।
हरीश बाबू ने दुकान का ताला लगाया और घर की तरफ़ चल दिए। रास्ते में उन्होंने जेब में हाथ डाला।
"आज समझ में आया... तिजोरी की पूँजी तो बस जेब का बोझ है, असली 'दिन की पूँजी' तो वे दुआएँ हैं जो आज कमा कर घर ले जा रहा हूँ।" मुस्कुराते हुए आसमान की तरफ़ देखा और बुदबुदाए।

—संक्षिप्त परिचय
विभा रानी श्रीवास्तव
गृहिणी
संस्थापक, अध्यक्ष -लेख्य-मंजूषा, पटना
सम्पादक- साहित्यिक स्पन्दन (त्रैमासिक पत्रिका)
संपर्क नंबर -९१६२४२०७९८

1 टिप्पणियाँ

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका