आबले दिल पर पड़े जो उनको सहलाएगा कौन,
ये है मरुथल फूल इसमें अब खिला पाएगा कौन।
हर घड़ी यह चाहता है रहना तेरे ही क़रीब,
इश्क़ में है बावला दिल इसको समझाएगा कौन।
जिनकी क़िस्मत में बचा माँ बाप का साया नहीं,
रूठने पर ऐसे मासूमों को बहलाएगा कौन।
बदनसीबी के अँधेरों में उजाले की किरण,
ला सके जो ऐसा इक सूरज नया लाएगा कौन।
ज़िन्दगी सहरा बनी है इसमें जीना है मुहाल,
फूल ख़ुशियों के मरुस्थल में खिला पाएगा कौन।
नाम पर मज़हब के खेला करते जो दहशत का खेल,
ऐसे नादाँ सिरफिरों को राह दिखलाएगा कौन।
- अशोक श्रीवास्तव
रायबरेली