महाकवि जयशंकर प्रसाद — छायावाद, शाश्वत दर्शन और मानवीय चेतना के अमर शिल्पी (कालजयी रचनाकार)

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल जब अपनी जड़ताओं को छोड़कर भावों की सघनता और अंतर्मुखी अनुभूतियों की ओर बढ़ रहा था, तब उस नवीन चेतना को स्वर देने वाले युगांतकारी रचनाकार बने—महाकवि जयशंकर प्रसाद (1889-1937)। प्रसाद जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे; उन्होंने नाटक, कहानी, उपन्यास और निबंध लेखन में नए प्रतिमान स्थापित किए, परंतु एक कवि के रूप में उनका स्थान अप्रतिम है। वे हिंदी काव्य जगत में 'छायावाद' के चार प्रमुख स्तंभों में से सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं।
आज के कॉलम (कालजयी रचनाकार) में आइए हम उनके विराट दर्शन, राष्ट्रप्रेम और उनके द्वारा रचित अमर पंक्तियों के मर्म को समझते हैं।
प्रसाद जी की कालजयी महाकृति 'कामायनी' केवल एक महाकाव्य नहीं है, बल्कि वह मानव चेतना के विकास का मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक इतिहास है। उन्होंने इच्छा, ज्ञान और क्रिया के समन्वय तथा 'आनंदवाद' की स्थापना पर बल दिया।

पंक्तियाँ:
ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की।
एक दूसरे से न मिल सकें, यह विडंबना है जीवन की।
भावार्थ: जब मनुष्य का सोचना (ज्ञान), उसका करना (क्रिया) और उसकी चाहत (इच्छा) अलग-अलग दिशाओं में भटकते हैं, तो जीवन में अंतद्वंद्व पैदा होता है। इन तीनों का एक सुर में मिलना ही जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता और पूर्णता है।

जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटकों के गीत आज भी भारत की राष्ट्रीय चेतना को उद्वेलित करते हैं। उनके गीतों में भारत की भौगोलिक सुंदरता के साथ-साथ यहाँ की गौरवशाली संस्कृति का अद्भुत चित्रण मिलता है।

पंक्तियाँ (चंद्रगुप्त नाटक से):
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
भावार्थ: हमारा भारतवर्ष उषाकालीन लालिमा की तरह मधुर, सुंदर और ऊर्जा से भरा हुआ है। यह एक ऐसा करुणामयी और विशाल हृदय देश है, जहाँ दूर-दराज से आने वाले अनजाने और असहाय लोगों को भी आश्रय और संबल मिलता है।

प्रसाद जी का काव्य केवल दर्शन तक सीमित नहीं है, उसमें मानवीय हृदय की कोमलतम भावनाएँ भी रची-बसी हैं। उनकी लंबी विरह-कविता 'आँसू' हृदय की गहराइयों को छू लेती है।

पंक्तियाँ:
इस करुणा कलित हृदय में अब विकल रागिनी बजती।
क्यों हाहाकार स्वरों में वेदना असीम गरजती?
भावार्थ: इस अत्यंत करुणा से भरे हुए व्याकुल हृदय में अब विरह का संगीत बजने लगा है। मन के भीतर उठे इस हाहाकार में छिपी हुई असीम पीड़ा अब शब्दों के माध्यम से बिखरने को आतुर है।

जयशंकर प्रसाद का साहित्य हमें सिखाता है कि भौतिक प्रगति के बीच मनुष्य को अपनी आंतरिक शांति, करुणा और मानवीय मूल्यों को कभी नहीं खोना चाहिए। उनकी रचनाओं की भाषा तत्समप्रधान, अलंकृत और बेहद संगीतमय है। उनका संपूर्ण जीवन और सृजन सचमुच कालजयी है, जो युगों-युगों तक हिंदी जगत का मार्गदर्शन करता रहेगा।
साभार और संदर्भ सूची :
स्रोत ग्रंथ: जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली, 'कामायनी' एवं 'आँसू' (मूल पाठ).
ऐतिहासिक संदर्भ: छायावाद और हिंदी आलोचना, आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत 'हिंदी साहित्य का इतिहास'।

विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के मंच से भारतीय मनीषा और छायावाद के अप्रतिम शिल्पी महाकवि जयशंकर प्रसाद के प्रति सादर साभार समर्पित है।

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